विश्वनाथ लकड़ा की कला में बसती है झारखंड की माटी, खूंटी से लंदन तक फैली है चित्रकारी की ख्याति
भारतीय समकालीन कला के मानचित्र पर झारखंड की माटी की महक और सांस्कृतिक गहराई को रंगों में उकेरने वाले चाईबासा के चित्रकार विश्वनाथ लकड़ा एक प्रतिष्ठित नाम हैं. उनकी कला....

Chaibasa, Jharkhand : भारतीय समकालीन कला के मानचित्र पर झारखंड की माटी की महक और सांस्कृतिक गहराई को रंगों में उकेरने वाले चाईबासा के चित्रकार विश्वनाथ लकड़ा एक प्रतिष्ठित नाम हैं. उनकी कला परंपरा और आधुनिकता के बीच एक कलात्मक सेतु है.

जलरंगों पर बेजोड़ पकड़
पटना विश्वविद्यालय से 1995 में चित्रकला में स्नातक लकड़ा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी बहुमुखी प्रतिभा है. लैंडस्केप, स्थिर चित्रण, अमूर्त कला और संयोजनों में दक्ष होने के बावजूद जलरंगों पर उनकी पकड़ उन्हें अलग बनाती है. जलरंगों में 'ट्रांसपेरेंसी' बनाए रखना सबसे कठिन माना जाता है, जिसमें वे माहिर हैं. उनके चित्रों में ठंडे और गर्म रंगों का संतुलन दर्शकों को वास्तविक सौंदर्यबोध का अनुभव कराता है.
'सेमी-यथार्थवादी' शैली में आदिवासी चरित्र
विश्वनाथ की कला का मुख्य आकर्षण उनके आदिवासी और जनजातीय चरित्र हैं. उन्होंने आदिवासी समाज को केवल देखा नहीं, बल्कि जिया है. वे आदिवासी पात्रों को 'सेमी-यथार्थवादी' शैली में ढालते हैं. यह शैली उन्हें कल्पना को विस्तार देने की स्वतंत्रता देती है.
न्यूनतम रेखाओं से वे पूरा चरित्र और उसकी पृष्ठभूमि तैयार कर देते हैं. उनके पात्रों के चेहरे की बनावट, अंगों का विन्यास और भंगिमाएं आदिवासी समाज के संघर्ष, सरलता और शालीनता को बयां करती हैं. पहनावे, आभूषण और काम करने के तरीकों में झारखंड की सांस्कृतिक विरासत स्पष्ट दिखती है. पात्रों की आंखों और मुद्रा में सामाजिक जुड़ाव झलकता है. चटक रंग उनके खुशियों और समकालीन जीवन शैली के प्रतीक हैं.
पत्रकारिता से अंतरराष्ट्रीय मंच तक
पटना में पढ़ाई के दौरान उन्होंने हिंदुस्तान, प्रभात खबर और पाटलिपुत्र टाइम्स में चित्रकार के रूप में काम किया. चित्रकार होने के साथ वे बांसुरी, ढोलक, मांदर, तबला, कोंगो जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्र भी बजाते हैं. छात्र जीवन में डांस और ड्रामा भी करते थे.
1994 से देश-विदेश में कई एकल और सामूहिक प्रदर्शनियां कर चुके हैं. 2007 में झारखंड सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किया गया. 2008 में इंग्लैंड में कलाकार विनिमय कार्यक्रम का हिस्सा रहे. उसी साल ब्रिटिश काउंसिल, यूके के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तहत लंदन गए, जहां नेशनल गैलरी में पिकासो, दा विंची, वान गॉग, क्लाड मोनेट के चित्रों को नजदीक से देखा.
2008 में ही झारखंड सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा रांची में उनकी कृतियों की प्रदर्शनी लगाई गई. 2015 में 56वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी, ललित कला अकादमी दिल्ली में जूरी मेम्बर रहे.
देश-विदेश में संग्रहित हैं कृतियां
आज उनकी कृतियों का संग्रह ललित कला अकादमी चेन्नई, त्रिशांत सेंटर फॉर क्रिएटिव आर्ट जम्मू, पूर्वी क्षेत्रीय संस्कृति केंद्र कोलकाता, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ आर्ट बेंगलुरु, ट्राइबल म्यूजियम गुमला झारखंड समेत देश-विदेश के व्यक्तिगत संग्रहों में है.
नई पीढ़ी को कर रहे संस्कारित
वर्तमान में विश्वनाथ लकड़ा नवोदय विद्यालय समिति, खूंटी में कला शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं. वे न केवल सृजन कर रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी कला के प्रति संस्कारित कर रहे हैं.
(चाईबासा से रमेश कुमार दास की रिपोर्ट)
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