राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने की थी जिनसे खास मुलाकात, स्वतंत्रता सेनानी बुधन सिंह की मनाई गई 57वीं पुण्यतिथि
स्वतंत्रता सेनानी बुधन सिंह की पुण्यतिथि शनिवार को मनाई गई. इनकी ख्याति के कारण ही वे प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की स्मरण सूची में भी शामिल थे. उनका राष्ट्रपति बनने के बाद जब लोहरदगा आगमन हुआ था, तब उन्होंने अपने काफिले को रुकवाकर बुधन सिंह से खास भेंट की थी.

Jharkhand (Lohardaga): लोहरदगा जिले के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर गांधीवादी बुधन सिंह की 57वीं पुण्यतिथि मनाई गई. बुधन सिंह को स्वतंत्रता आंदोलनों के समय साल 1932 व 1942 के दौरान जेल भी जाना पड़ा था. वह सामाजिक कुरीतियों के प्रबल विरोधी थे. इनकी पुण्यतिथि पर जिले के उपायुक्त डॉक्टर कुमार ताराचंद ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धा सुमन अर्पित किया. उन्होंने कहा कि लोहरदगा में पद ग्रहण करने के पूर्व ही बुधन सिंह जी की अद्भुत व साहसिक जीवन यात्रा की जानकारी मुझे इतिहास के पन्नों में पढ़कर मिली थी. उनके गरीब होने के बावजूद राष्ट्र के प्रति समर्पण तथा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लड़ने का जज्बा अद्वितीय है तथा समाज को ऐसे सपूतों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है. इस मौके पर काफी संख्या में लोहरदगा के गणमान्य लोग मौजूद थे.

गरीबी में बीता बुधन सिंह का जीवन
बुधन सिंह का जन्म सन् 1912 में हुआ था. उनका नाम नंदलाल सिंह रखा गया, लेकिन वे आगे चलकर बुधन सिंह के नाम से ही विख्यात हुए. बुधन सिंह का बचपन अभावों में बीता. पिता कुलवंशी सिंह की मृत्यु के बाद मां धनेश्वरी देवी नगर के कुछ सहृदय साहूकारों के लिए चक्की पर गेहूं व मकई पीसा करती थीं और एक मुंहबोले जुलाहे भाई रसूल मियां की दुकान के लिए झूला (ब्लाउज) सिला करती थीं. इससे उन्हें कुछ आय हो जाती थी, जिससे परिवार का भरण-पोषण होता था.

1932 में कर लिया था अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार
इनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय प्राथमिक स्कूल में ही हुई. वे महज तीसरी कक्षा तक ही पढ़ाई कर सके. ये वह समय था, जब देश में कांग्रेस आजादी के आंदोलन की पर्याय बन चुकी थी. चारों तरफ ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आक्रोश पनप रहा था. लोहरदगा में भी टाना भगत और गांधीजी का संदेश घर-घर पहुंचा रहे थे. बुधन सिंह इस प्रभाव और आंदोलन से अपने को अलग नहीं रख सके. वे अंग्रेजी सरकार विरोधी साहित्य का प्रचार करने लगे, जिसका सरकार के खुफिया विभाग को पता था. उन्हें क्रांतिकारी साहित्य बेचने के आरोप में सन् 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर देशद्रोह का मुकदमा चला. दो साल की सजा हुई. जेल में उन्हें राजेंद्र बाबू, श्रीकृष्ण सिंह और रामवृक्ष बेनीपुरी समेत कई दिग्गजों का सानिध्य और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ जिसे उनकी नेतृत्व क्षमता और देश प्रेम की भावना और बढ़ गई. सजा काटकर जब ये घर लौटे तो राय साहब बलदेव साहु ने अपने यहां ड्राइवर की नौकरी दे दी.

राजेंद्र प्रसाद का शर्त बुधन सिंह तक आकर रुका
इनके साथ एक अविस्मरणीय घटना भी घटी जब 1940 में कांग्रेस का रामगढ़ अधिवेशन हुआ जहां राजेंद्र बाबू भी आए थे और उन्होंने एक शर्त रख दी कि उनका ड्राइवर वही होगा जो खादीदारी हो. पूरे सम्मेलन में बुधन सिंह ही ऐसे ड्राइवर निकले जो खादीधारी थे और उन्होंने राजेंद्र बाबू को अधिवेशन स्थल तक पहुंचाया. सन् 1953 में जब बतौर राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद लोहरदगा तो उन्होंने मेन रोड पर अपने काफिले को रुकवाकर बुधन सिंह से भेंट की थी.
छुआछूत की कुप्रथा के घोर विरोधी
उन्होंने छुआछूत जैसी कुप्रथा का विरोध किया और लोहरदगा के ठाकुरबाड़ी मंदिर में दलित समाज के लोगों का प्रवेश करवाया जिसके लिए इनपर मुकदमा भी हुआ और विरोध भी झेलना पड़ा. सन् 1936 में रामनवमी पूजा सार्वजनिक रूप से धूमधाम के साथ आरंभ की और जुलूस निकाला.
आजीवन रहे 'खादीधारी'
वे आजीवन खादीधारी रहे. अपनी मृत्यु के पूर्व उन्होंने अपने पर कह रखा था कि उनका कफन खादी का ही होगा. उनकी इच्छानुसार उन्हें खादी का कफन दिया गया. बुधन सिंह ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें न ताम्रपत्र की चाह थी और न ही पेंशन की.









