सर्च-सीजर ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग और सीजर मेमो नहीं देने के क्या हैं मायने? जानिए क्यों सुप्रीम कोर्ट ने तीन पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत की थी खारिज
मनिका थाना प्रभारी पर गंभीर आरोप: सांसद ने DIG से की निष्पक्ष जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का दिया हवाला

Jharkhand latehar : मनिका थाना प्रभारी पर वाहन जब्ती, कथित रूप से पैसे की मांग, अभद्र व्यवहार और मानसिक उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाए जाने का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी तूल पकड़ने लगा है। मामले को गंभीरता से लेते हुए चतरा सांसद कालीचरण सिंह ने पलामू प्रक्षेत्र के डीआईजी कौशल किशोर को पत्र सौंपकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, स्वतंत्र एवं उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है।
सांसद द्वारा दिए गए आवेदन में पलामू जिले के सतबरवा थाना क्षेत्र अंतर्गत पिपरा कला निवासी मुकेश कुमार यादव की शिकायत का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि मनिका थाना प्रभारी द्वारा उनके वाहन को जब्त किया गया। इस दौरान उनसे कथित रूप से पैसे की मांग की गई, अभद्र व्यवहार किया गया तथा मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनका कहना है कि पूरी कार्रवाई के दौरान उन्हें लगातार दबाव में रखा गया और कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों से भी वंचित किया गया।
सांसद कालीचरण सिंह ने डीआईजी से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच कराई जाए। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता, शक्ति के दुरुपयोग या अवैध कार्रवाई सामने आती है तो संबंधित पुलिस पदाधिकारियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि आम लोगों का कानून और पुलिस व्यवस्था पर विश्वास बना रहे। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला State of Maharashtra vs. Rahul Dutta Bhosle & Others (27 मई 2026, Citation: 2026 INSC 596) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यदि कानून लागू करने वाले अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं या नागरिकों के साथ मनमाना एवं गैरकानूनी व्यवहार करते हैं, तो यह कानून के शासन और जनता के विश्वास पर सीधा आघात है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष, स्वतंत्र और प्रभावी जांच आवश्यक है ताकि सच्चाई सामने आए और दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई हो सके। वाहन जब्ती की प्रक्रिया पर उठे सवाल शिकायतकर्ता का आरोप है कि वाहन जब्त करते समय उन्हें सीजर मेमो (जब्ती सूची/पंचनामा) की प्रति नहीं दी गई, जब्ती का कारण स्पष्ट नहीं बताया गया और पूरी कार्रवाई का समुचित दस्तावेजीकरण भी नहीं किया गया।
शिकायत के अनुसार, किसी भी जब्ती की स्थिति में संबंधित व्यक्ति को जब्ती सूची, जब्ती का समय, स्थान, आधार तथा गवाहों का विवरण उपलब्ध कराना आवश्यक होता है। ऐसा नहीं होने पर पूरी कार्रवाई की पारदर्शिता और वैधानिकता पर प्रश्न उठ सकते हैं। ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं करने के क्या हैं मायने? सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक तकनीक के उपयोग पर विशेष बल दिया है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधान के अनुसार तलाशी और जब्ती जैसी महत्वपूर्ण कार्रवाई की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की जानी चाहिए, ताकि बाद में विवाद होने पर वास्तविक तथ्यों का सत्यापन किया जा सके और जांच व न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे। यदि ऐसी रिकॉर्डिंग नहीं होती और सीजर मेमो भी उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, केवल रिकॉर्डिंग न होना अपने-आप में हर मामले में पूरी कार्रवाई को अवैध नहीं बना देता; इसका मूल्यांकन मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाता है। क्यों खारिज हुई थी तीन पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत? सुप्रीम कोर्ट ने उक्त मामले में तीन पुलिसकर्मियों को अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि यदि प्रथम दृष्टया यह आरोप हो कि कानून लागू करने वाले अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग किया, नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन किया या तलाशी एवं जब्ती की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं बरतीं, तो ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। अदालत ने माना कि ऐसे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जांच प्रभावित होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए अग्रिम जमानत देना उचित नहीं होगा। सांसद ने की कार्रवाई की मांग सांसद कालीचरण सिंह ने अपने आवेदन में मांग की है कि यदि जांच में शिकायत सही पाई जाती है तो संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कठोर एवं विधिसम्मत कार्रवाई की जाए। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर वस्तुस्थिति स्पष्ट की जाए, ताकि किसी भी प्रकार की भ्रांति समाप्त हो सके।
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