झारखंड की पारंपरिक कला को मिली विशिष्ट पहचान, 11 उत्पादों को मिला GI टैग, निर्यात में होगी बढ़ोतरी
झारखंड की 11 पारंपरिक कला शैलियों को जीआई से नवाजा जा चुका है. इसमें नाबार्ड ने मुख्य भूमिका निभाई है.

Ranchi, Jharkhand: झारखंड के पारंपरिक उत्पाद विक्रेताओं और निर्माताओं के लिए बड़ी खुशखबरी सामने आई है. दरअसल राज्य के 11 स्पेशल उत्पादों को GI टैग (Geographical Indication) प्राप्त हुआ है. अब इनकी विशेष पहचान सुरक्षित रहेगी और देश भर में इनकी प्रामाणिकता को फैलाया जा सकेगा.
इसके पहले साल 2020 में सोहराई-खोवर पेंटिंग को जीआई टैग दिया गया था, जो अब तक झारखंड का एकमात्र जीआई टैग प्राप्त उत्पाद था. अब इनकी कुल संख्या 12 हो चुकी है.
कौन-कौन से उत्पाद हैं इस सूची में शामिल
भगैया साड़ी और फैब्रिक, कुचाई सिल्क साड़ी, मुंडा ज्वेलरी, झारखंड बांस शिल्प (बैंबू क्राफ्ट), तसर सिल्क और साड़ियां, केसरिया कलाकंद (कोडरमा), डोकरा क्राफ्ट, दुमका चादर, बडोनी पपेट्स, जादोपटिया पेंटिंग और पांची साड़ी और फैब्रिक.
इन उत्पादों में क्या है खास :
केसरिया कलाकंद
पंजाब से झारखंड के झुमरीतिलैया आकर बसे होटल मालिक कर्ण सिंह भाटिया और पुत्र हंसराज भाटिया ने पहली बार इस कलाकंद को बनाना 1950 के दशक में शुरू किया था. इनकी दुकान 1980 के दशक में बंद हो गई, लेकिन इस कलाकंद निर्माण की प्रक्रिया ने पारंपरिक रूप ले लिया. आज कोडरमा के इस केसरिया कलाकंद का स्वाद विदेशों तक प्रचलित है.
कुचाई सिल्क साड़ी
सरायकेला-खरसावां जिले का कुचाई क्षेत्र अपने उच्च गुणवत्ता वाले ऑर्गेनिक रेशम के लिए जाना जाता है. कुचाई सिल्क पूरी तरह से प्राकृतिक और शुद्ध रेशम है, जिसे स्थानीय आदिवासी समुदाय पारंपरिक करघों पर बुनकर साड़ियों और कपड़ों का रूप देते हैं.
मुंडा ज्वेलरी
मुंडा ज्वेलरी मुख्य रूप से पीतल, कांसा, और चांदी जैसी धातुओं से पूरी तरह हाथों द्वारा बनाई जाती है. मुख्य रूप से इसे बनाने का काम रांची व आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों द्वारा किया जाता है.
भगैया साड़ी और फैब्रिक
गोड्डा जिले के भगैया ब्लॉक में बनने वाले इस सिल्क फैब्रिक का एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक और आर्थिक महत्व है. भगैया क्षेत्र में लगभग 20,000 से अधिक बुनकर परिवार रहते हैं, जो पीढ़ियों से तसर और मटका सिल्क के धागों से बेहतरीन साड़ियां, चादरें और थान का कपड़ा तैयार कर रहे हैं. भगैया साड़ी अपनी मजबूती, महीन धागों की बुनाई और पारंपरिक कलात्मक बॉर्डर्स के लिए देश भर के कपड़ा बाजारों में मशहूर है.
जादोपटिया पेंटिंग
संथाल जनजाति की यह पारंपरिक कला दुमका की प्राचीन चित्रकला श्रेणियों में से एक है. 'जादो' का अर्थ होता है चित्रकार और 'पटिया' का अर्थ होता है कपड़े या कागज की स्क्रॉल (पट्टियां). चित्रकार कागज या सूती कपड़ों की लंबी पट्टियों पर प्राकृतिक रंगों से पूरी कहानी चित्रित करते हैं.
प्रक्रिया में शामिल अन्य उत्पाद
इनके अलावा, झारखंड सरकार और नाबार्ड द्वारा कुछ अन्य प्रसिद्ध उत्पादों जैसे देवघर का अट्ठे मटन, सिमडेगा की मीठी इमली, सरायकेला की कुचाई हल्दी और पारंपरिक व्यंजन मडुआ छिलका को भी जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया और कागजी कार्रवाई तेजी से चल रही है.
GI टैग क्या होता है?
जीआई टैग (GI Tag) का पूरा नाम जियोग्राफिकल इंडिकेशन (Geographical Indication) है, जिसे हिंदी में 'भौगोलिक संकेतक' कहा जाता है. यह मुख्य रूप से एक कानूनी प्रमाण पत्र या प्रतीक है, जो किसी उत्पाद की विशेष भौगोलिक उत्पत्ति, उसके विशेष गुणों और उसकी ऐतिहासिक प्रतिष्ठा के आधार पर दिया जाता है. सरल शब्दों में, यह इस बात की गारंटी है कि कोई खास उत्पाद किसी विशेष क्षेत्र में ही बनता है और उसका असली स्वाद या गुणवत्ता कहीं और नहीं मिल सकती.
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