लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चे को मिलेगा मां का सरनेम?, जानिए कर्नाटक हाई कोर्ट ने क्या कहा...
कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चे के सरनेम में मां का पारिवारिक नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया जा सकता है।

New Delhi: भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बहस नई नहीं है, लेकिन ऐसे रिश्तों से जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों को लेकर लोगों के मन में आज भी कई सवाल हैं। क्या बच्चे को पिता का नाम मिलेगा? क्या जन्म प्रमाण पत्र में बदलाव हो सकता है? क्या उसे कानूनी अधिकार मिलेंगे? इन सवालों पर कर्नाटक हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने अहम टिप्पणी की है।
मां का सरनेम जोड़ने की अनुमति
कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा है कि यदि मां चाहे तो वह बच्चे के सरनेम में अपने परिवार का नाम जोड़ने के लिए आवेदन कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा करने से जन्म प्रमाण पत्र में दर्ज जैविक पिता का नाम अपने आप नहीं हट जाएगा। यानी बच्चे की पहचान में मां का सरनेम जोड़ा जा सकता है, जबकि रिकॉर्ड में पिता का नाम भी बरकरार रह सकता है।
अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य बच्चे की पहचान, सम्मान और उसके सर्वोत्तम हित की रक्षा करना है, न कि माता-पिता के वैवाहिक संबंधों के आधार पर उसके अधिकार तय करना।
जन्म प्रमाण पत्र में कब हो सकता है बदलाव?
हाई कोर्ट के मुताबिक, यदि मां उचित कारण और आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन करती है तो जन्म प्रमाण पत्र में सरनेम से जुड़ा संशोधन किया जा सकता है। हालांकि यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होती। हर मामले का फैसला उसके तथ्यों, उपलब्ध दस्तावेजों और संबंधित प्राधिकरण की जांच के आधार पर किया जाएगा।
लिव-इन से जन्मे बच्चे के अधिकार क्या हैं?
भारतीय कानून का सिद्धांत साफ है कि किसी बच्चे के साथ सिर्फ इसलिए भेदभाव नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके माता-पिता ने शादी नहीं की। ऐसे बच्चों को भी पहचान, देखभाल और परिस्थितियों के अनुसार संपत्ति या विरासत से जुड़े कानूनी अधिकार मिल सकते हैं। अलग-अलग मामलों में अदालतें लगातार यह कहती रही हैं कि बच्चे के हित को सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए।
कानून क्या कहता है?
जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत रजिस्ट्रार को रिकॉर्ड में आवश्यक संशोधन करने का अधिकार है। यदि दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर उचित कारण साबित होते हैं, तो जन्म प्रमाण पत्र में सरनेम से जुड़े बदलाव किए जा सकते हैं। हालांकि हर मामला अलग होता है और तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होता है।
क्या है इस फैसले का संदेश?
कर्नाटक हाई कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि बच्चे के अधिकार उसके माता-पिता की वैवाहिक स्थिति से तय नहीं होंगे। अदालत ने कहा कि बच्चे की पहचान, सम्मान और भविष्य की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
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