चतरा में कभी बाहर से आता था तिलकुट, आज उड़ीसा से राउरकेला तक है डिमांड
पिछले कुछ वर्षों तक चतरा के कारोबारी दूसरे शहरों से तिलकुट मंगाकर बेचते थे, लेकिन आज स्थिति उलट है. अब यहां का तिलकुट झारखंड के विभिन्न जिलों सहित उड़ीसा, राउरकेला और हजारीबाग तक भेजा जा रहा है.

JHARKHAND (CHATRA): मकर संक्रांति का पावन त्योहार नजदीक है और हर तरफ तिल और गुड़ की खुशबू फैलने लगी है. झारखंड का जो शहर कभी तिलकुट के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर था. आज वही चतरा. उड़ीसा और राउरकेला जैसे बड़े शहरों का मुंह मीठा कर रहा है. तमाम दुकानों में सजे तिलकुट और गुड़-तिलवा साफ बता रहे हैं कि त्योहार की तैयारी पूरी हो चुकी है.
कारीगरों को अपने ही शहर में मिल रहा रोजगार
पिछले कुछ वर्षों तक चतरा के कारोबारी दूसरे शहरों से तिलकुट मंगाकर बेचते थे, लेकिन आज स्थिति उलट है. अब यहां का तिलकुट झारखंड के विभिन्न जिलों सहित उड़ीसा, राउरकेला और हजारीबाग तक भेजा जा रहा है. यहां के कारीगर पहले काम की तलाश में रांची जैसे बड़े शहरों में जाया करते थे. लेकिन अब उन्हें अपने ही शहर यानी चतरा में रोजगार मिल रहा है.

चतरा के बाजारों में तिलकुट की कई किस्में उपलब्ध
चतरा के बाजारों में तिलकुट की कई किस्में उपलब्ध हैं. मुख्य रूप से चीनी, गुड़ और खोया से तैयार ये तिलकुट शुद्धता की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं. कीमत की बात करें, तो यह 240 रुपये प्रति किलो से शुरू होकर 300 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है. इसके साथ ही तिल-गुड़ के लड्डू, गजक, सोंधी रेवड़ी और 'तिलवा' की भी जबरदस्त मांग है. लोगों को भी यहां के उत्पाद और उसकी क्वालिटी पंसद आ रही है.
बढ़ते कारोबार और समृद्ध होती परंपरा की कहानी
मकर संक्रांति के दिन चूड़ा, दही और तिलकुट का प्रसाद ग्रहण करने की सदियों पुरानी परंपरा है. चतरा के बाजारों में छाई रौनक. तिलकुट के मामले में बढ़ते कारोबार और समृद्ध होती परंपरा की कहानी कह रही है. यह चतरा के लिए गौरव की बात है कि यहाँ का स्वाद अब सरहदों के पार अपनी पहचान बना रहा है.
रिपोर्ट : मो. रिजवान









