India-EU Trade Deal: दो दशकों से चल रही बातचीत को मिला अंतिम पड़ाव, PM ने बताया- "मदर ऑफ ऑल डील्स"
भारत की यूरोपियन यूनियन के साथ ट्रेड डील पर बातचीत की शुरुआत करीब दो दशकों पूर्व हुई थी. जिसपर पूर्ण सहमती अब जाकर बन चुकी है. जहां पीएम द्वारा इसे मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स बताया जा रहा है, वहीं ऑटोमोबाइल सहित कई सेक्टरों के जरिए आम नागरिकों को फायदे मिलने की बात भी की जा रही है.

India-EU Trade Deal: तकरीबन दो दशकों से चल रही बातचीत के बात 27 जनवरी 2026 को India-EU ट्रेड डील अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है. भारत और यूरोपीय संघ ने आखिरकार एक महत्वाकांक्षी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर बातचीत पूरी कर ली है, जिसे "मदर ऑफ ऑल डील्स" कहा जा रहा है. लंबी चर्चा और आखिरी समय में हुए समझौतों के बाद यह डील तय हुई है. इससे दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार पर बड़ा असर पड़ने की उम्मीद है.
उम्मीद लगाए जा रहे हैं कि इस समझौते पर इस साल के अंत तक हस्ताक्षर हो जाएंगे और यह अगले साल की शुरुआत से लागू हो सकता है. 18 साल बाद ये वार्ता संपन्न हुई. बातचीत 2007 में शुरू हुई थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को घोषणा की कि भारत और यूरोपीय संघ एक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर पहुंच गए हैं, और कहा कि यह वैश्विक जीडीपी का 25% और वैश्विक व्यापार का एक तिहाई हिस्सा है.
सफल भारत विश्व के हित में
सोमवार (26 जनवरी, 2026) को वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने पुष्टि की थी कि “आधिकारिक स्तर की वार्ता समाप्त होने वाली है और दोनों पक्ष 27 जनवरी को मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) वार्ता के सफल समापन की घोषणा करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.” यूरोपीय संघ के नेताओं ने कहा कि “सफल भारत” विश्व के हित में है.
दुनिया का सबसे बड़ा द्विपक्षीय समझौता!
यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते का समापन दो दशक लंबी प्रक्रिया का अंत है, जिसकी वार्ता पहली बार 2007 में शुरू हुई थी. द्विपक्षीय व्यापार पहले ही 136 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है, और सूत्रों ने यह भी कहा कि यह दुनिया के “सबसे बड़े” द्विपक्षीय समझौतों में से एक होगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया समझौता व्यापार को और बढ़ाएगा, लागत घटाएगा और भारत को एक मजबूत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब बनाएगा.
ऑटोमोबाइल सेक्टर में भारतीयों को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत ने यूरोप के कई प्रोडक्ट पर इंपोर्ट ड्यूटी कम करने का वादा किया है. इसके बदले, EU भारत के मैन्युफैक्चरिंग, केमिकल, टैक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कई सेक्टर में बेहतर बाजार पहुंच देगा. ऑटोमोबाइल सेक्टर सबसे विवादित क्षेत्र रहा. वर्तमान में भारत में विदेशी कारों पर 100% से भी ज्यादा इंपरोर्ट ड्यूटी लगती है, खासकर प्रीमियम और लक्जरी कारों पर. नए समझौते के तहत, यूरोपीय देशों में बनी कारों पर ड्यूटी लगभग 40% तक घटाई जा सकती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत इंपोर्ट ड्यूटी को 110% से कम करने पर विचार कर रहा था. इससे यूरोप से भारत में कारें लाना सस्ता होगा और वैश्विक कंपनियों को भारत में निवेश बढ़ाने का अवसर मिलेगा.
यूरोपीय कंपनियों की कारें होंगी सस्ती
Volkswagen, BMW, Mercedes-Benz और Renault जैसी कंपनियों के लिए यह समझौता भारत के तेजी से बढ़ते ऑटो मार्केट में और गहरा प्रवेश करने का रास्ता खोलेगा. लक्जरी इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को खास फायदा होगा. भारत में 40,000 डॉलर से ज्यादा कीमत वाली यूरोपीय कारों पर लगभग 100% इंपोर्ट ड्यूटी लगती है. लक्जरी EVs, जो आमतौर पर 1 करोड़ रुपए से शुरू होती हैं, इस कैटेगरी में आती हैं. FTA के बाद ड्यूटी कम होने से यूरोपीय कंपनियां अपनी कारों की कीमतें ज्यादा कॉम्पिटेटिव बना पाएंगी.
आज भारत-EU व्यापार की स्थिति
मार्च 2025 तक समाप्त वित्तीय वर्ष में, भारत और EU के बीच सामानों का द्विपक्षीय व्यापार 136 अरब डॉलर से ज्यादा रहा.
भारत का EU में निर्यात: 75.9 अरब डॉलर
EU से भारत का आयात: 60.7 अरब डॉलर
मुख्य निर्यात कैटेगरी:
रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट - 15.0 अरब डॉलर
डीजल: 9.3 अरब डॉलर
एविएशन टरबाइन फ्यूल: 5.4 अरब डॉलर
इन प्रोडक्ट पर FTA के तहत ज्यादा बदलाव की संभावना नहीं है, क्योंकि इन पर पहले से ही कम टैरिफ लगता है और इनकी कीमतें मुख्य रूप से वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर निर्भर करती हैं.
इलेक्ट्रॉनिक्स - 11.3 अरब डॉलर
इसमें स्मार्टफोन का योगदान 4.3 अरब डॉलर है, जो दिखाता है कि भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए एक बड़ी असेंबली और निर्माण केंद्र बनता जा रहा है.
भारत को कैसे होगा फायदा?
अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंचाए बिना कई फायदे देगा. Global Trade Research Initiative (GTRI) का मानना है कि टैरिफ में कटौती से भारतीय प्रोडक्ट की इनपुट लागत कम होगी, वैल्यू चेन में गहरी भागीदारी बढ़ेगी और भारत की कॉम्पिटेटिव स्थिति मजबूत होगी. इसके अलावा, व्यापार की मात्रा बढ़ने से भारत का वैश्विक व्यापार नेटवर्क मजबूत होगा और देश को लंबे समय में स्ट्रक्चरल लाभ मिलेंगे.
भारत से यूरोप में जो सामान जाता है, वो यूरोप के दूसरे देशों से आने वाले आयात की जगह लेता है, इसलिए यूरोप की अपनी फैक्ट्रियों को कोई नुकसान नहीं होता. वहीं, यूरोप से आने वाले सामान सीधे भारत की फैक्ट्रियों और छोटे-मध्यम उद्योगों (MSME) में जाता है, जिससे प्रोडक्शन बढ़ता है और भारत का निर्यात मजबूत होता है. इस तरह, यह समझौता भारत के लिए लॉन्ग टर्म में फायदा पहुंचाएगा और देश की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करेगा.









