‘भूमिहार ब्राह्मण’ से सिर्फ ‘भूमिहार’ कैसे हुआ? RTI के बाद सरकार के पुराने जवाब पर उठे सवाल
बिहार में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ से ‘भूमिहार’ नाम किए जाने का विवाद अब नया मोड़ ले चुका है। RTI के जवाब में सवर्ण आयोग ने ऐसी किसी सिफारिश से इनकार किया है। आखिर फिर नाम बदलने का


बिहार में आधिकारिक नाम को लेकर चल रही बहस अब सिर्फ 'भूमिहार ब्राह्मण' V/s 'भूमिहार' तक सीमित नहीं रह गई है। आईटीआई से सामने आई जानकारी ने इस विवाद में और नए सवाल जोड़ दिए हैं। RTI के जवाब में उच्च जातियों के विकास के लिए राज्य आयोग ने कहा है कि उसकी संचिका में भूमिहार ब्राह्मण से सिर्फ भूमिहार करने की कोई अनुशंसा दर्ज नहीं है।
मामला शुरू कहां से हुआ?
दरअसल 24 जुलाई को बिहार विधानसभा में भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा ने जमीन से जुड़े दस्तावेज में जाति का नाम का मुद्दा उठाया था। उनकी मांग थी कि सरकारी दस्तावेज में जाति का नाम भूमिहार ब्राह्मण दर्ज किया जाए। इस पर जवाब देते हुए उप मुख्यमंत्री और सामान्य प्रशासन विभाग के प्रभारी मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा था की स्वर्ण आयोग की सिफारिश के आधार पर 'भूमिहार ब्राह्मण' का नाम बदलकर 'भूमिहार' किया गया था। यानी कि सरकार की ओर से नाम बदलने की प्रक्रिया आयोग की सिफारिश की देन थी। लेकिन RTI के जवाब में इसी दावे को सवालों के घेरे में ला दिया है।
RTI में आयोग ने क्या कहा?
RTI के जरिए पूछे गए सवाल में राज्य आयोग ने बताया कि उनकी फाइल में ADRI ( Asian Development Research Institute) की रिपोर्ट को सामान्य प्रशासन विभाग को भेजे जाने का कोई उल्लेख है ही नहीं। इसके अलावा आयोग ने यह भी कहा की "भूमिहार ब्राह्मण' से 'ब्राह्मण' शब्द हटाने की कोई सिफारिश आयोग ने नहीं की थी। मामला इसलिए चर्चा का केंद्र बन गया है क्योंकि अब तक नाम बदलने के संदर्भ में ADRI और आयोग की रिपोर्ट का हवाला दिया जाता रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि अगर आयोग में नाम बदलने के सिफारिश नहीं की थी तो फिर 'भूमिहार ब्राह्मण' से 'भूमिहार' नाम किस आधार पर किया गया?
सरकार का पक्ष भी समझिए
उच्च जाति के विकास के लिए राज्य आयोग के अध्यक्ष डॉक्टर महाचंद्र प्रसाद सिंह ने भी कहा कि आयोग ने कभी ऐसी सिफारिश नहीं की। उन्होंने यह भी बताया की भूमिहार ब्राह्मण होने से जुड़ी साक्ष्य सामान्य प्रशासन विभाग को भेजे जा चुके हैं। इस बयान के बाद अब सरकार और आयोग के रिकॉर्ड के बीच अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
विधानसभा में दिए गए जवाब को लेकर उप मुख्यमंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों द्वारा मिली जानकारी के आधार पर ही सदन में जवाब दिया था। उनका कहना है की विभागीय अधिकारियों ने उन्हें लिखकर जानकारी दी थी की स्वर्ण आयोग की अनुशंसा के आधार पर ही नाम भूमिहार किया गया। यानी इस पूरे मामले में दो पक्ष सामने आए हैं। एक सरकार का जिनका कहना है कि अधिकारियों से मिली जानकारी के आधार पर आयोग की सिफारिश का हवाला दिया गया और दूसरा आयोग के आरटीआई जवाब का जिसमें कहा गया कि आयोग की फाइल में ऐसी सिफारिश का रिकॉर्ड नहीं है।
2015 की आद्री रिपोर्ट भी सवालों के घेरे में
इस पूरे विवाद में 2015 की आद्री रिपोर्ट का भी जिक्र होता रहा है। लेकिन आईटीआई में आयोग की ओर से या कहा गया कि उसकी संचिका में आद्री की रिपोर्ट को सामान्य प्रशासन विभाग को भेजे जाने का कोई उल्लेख नहीं है। फिलहाल यह मामला जाति के नाम से आगे निकलकर प्रशासनिक रिकॉर्ड और प्रशासनिक प्रक्रिया का सवाल बन गया है।

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