रांची में खोरठा भाषा पर पहला राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित, संरक्षण और डिजिटलीकरण पर जोर
राजधानी रांची स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और रामलखन सिंह यादव कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया.

Ranchi, Jharkhand: राजधानी रांची स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और रामलखन सिंह यादव कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी का उद्देश्य खोरठा भाषा एवं साहित्य की समृद्ध परंपरा, उसके संरक्षण, संवर्धन तथा वर्तमान सामाजिक और शैक्षणिक संदर्भों में उसकी भूमिका पर गंभीर विमर्श करना था. कार्यक्रम में शिक्षाविदों, शोधार्थियों, साहित्यकारों एवं भाषा प्रेमियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही.
"स्थानीय भाषाओं के संरक्षण के लिए संस्थागत प्रयास की आवश्यकता"
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि रांची विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सरोज शर्मा ने संबोधन में उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि स्थानीय भाषाओं के संरक्षण एवं विकास के लिए संस्थागत प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं. उन्होंने शब्दसिंधु द्वारा क्षेत्रीय एवं विलुप्तप्राय भाषाओं के शब्दकोश निर्माण तथा अनुवाद कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि शोध एवं दस्तावेजीकरण के माध्यम से इन भाषाओं को नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुंचाया जा सकता है. उन्होंने विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों से क्षेत्रीय भाषाओं पर अधिकाधिक शोध कार्य करने का आह्वान किया.
"जनजातीय भाषाएं बौद्धिक परंपरा की आधारशिला"
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. वीके महतो ने कहा कि क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाएं किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान और बौद्धिक परंपरा की आधारशिला होती हैं. उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा छोटी या बड़ी नहीं होती, बल्कि प्रत्येक भाषा अपने समाज की चेतना, परंपरा और ज्ञान को अभिव्यक्त करती है. उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों से मातृभाषाओं के अध्ययन और शोध में सक्रिय भागीदारी निभाने की अपील की.
खोरठा - प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में से एक
निदेशक डॉ. कुमार संजय झा ने वक्तव्य में खोरठा को झारखंड की प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में से एक बताते हुए कहा कि यह केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि लोकजीवन, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान की महत्वपूर्ण वाहक है. उन्होंने भाषा के संरक्षण, प्रचार-प्रसार एवं अकादमिक अध्ययन की आवश्यकता पर विशेष ध्यान की जरूरत बताई.
खोरठा बोलने वाले 1 करोड़ से अधिक
डॉ. कमल कुमार बोस ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि क्षेत्रीय भाषाएं भी मुख्यधारा की भाषाओं के समान ही महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा का विकास समाज, शिक्षण संस्थानों और सरकार के संयुक्त प्रयासों से ही संभव है. उन्होंने उल्लेख किया कि खोरठा भाषा एक करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है, जो इसकी व्यापकता और सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है.
ई-संसाधनों से जुड़ाव पर दिया गया जोर
सेमिनार के आयोजन सचिव डॉ अमित कुमार ने खोरठा भाषा के डिजिटलीकरण, ई-संसाधनों के निर्माण तथा आधुनिक तकनीक से इसके जुड़ाव पर जोर देने की बात कही. यह खोरठा भाषा का पहला राष्ट्रीय सेमिनार है, स्वतंत्र रूप से कभी खोरठा भाषा का सेमिनार अब तक नहीं हुआ था. ने कहा कि डिजिटल माध्यमों के उपयोग से खोरठा भाषा और साहित्य को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल सकती है. साथ ही महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं अकादमिक कृतियों के खोरठा में अनुवाद की आवश्यकता पर भी बल दिया गया.
शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोध
संगोष्ठी के दो सत्रों में शोधार्थियों एवं विद्वानों ने खोरठा साहित्य, लोकपरंपरा, भाषा विज्ञान, ज्ञान परंपरा तथा समकालीन संदर्भों से जुड़े विषयों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए. इस अवसर पर डॉ. बी. एन. ओहदार, डॉ. कुमारी शशि, डॉ. अर्चना कुमारी, डॉ. गजाधर महतो प्रभाकर, डॉ. अवध बिहारी महतो, डॉ. राहुल कुमार , श्री जय प्रकाश रजक , डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. निरंजन कुमार एवं श्री बीरबल महतो ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए. शोधपत्रों में खोरठा भाषा की भाषिक संरचना, लोकसाहित्य, सांस्कृतिक चेतना तथा वर्तमान समय की चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर चर्चा की गई. वक्ताओं ने इस बात पर भी बल दिया कि भाषा का संरक्षण केवल साहित्य तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और तकनीकी माध्यमों से भी जोड़ना आवश्यक है.
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया. संगोष्ठी ने खोरठा भाषा एवं साहित्य के संरक्षण, संवर्धन और अकादमिक विस्तार की दिशा में सार्थक संवाद स्थापित करने का कार्य किया.
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