‘पहले घर दो, फिर तोड़ो’! दलित परिवारों का बुलडोजर चलने पर छलका दर्द
नालंदा के अस्थावां प्रखंड के जियार गांव में अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई के बाद करीब 10 से 12 महादलित परिवारों के सामने रहने का संकट खड़ा हो गया है।


नालंदा: “पहले रहने की जगह दो, फिर घर तोड़ो…” नालंदा के अस्थावां प्रखंड स्थित जियार गांव में प्रशासन की अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद महादलित परिवारों का यही दर्द सामने आ रहा है। रविवार को पुलिस बल के साथ पहुंची प्रशासन की टीम ने कई घरों और झोपड़ियों को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया। कार्रवाई के बाद करीब 10 से 12 परिवारों के सामने अब रहने की समस्या खड़ी हो गई है। घर टूटने के बाद प्रभावित परिवारों में अफरा-तफरी का माहौल है। बरसात के मौसम में छोटे बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ खुले आसमान के नीचे रहने की चिंता ने उनकी मुश्किल और बढ़ा दी है।
ग्रामीणों का आरोप- शिकायत करने वालों पर नहीं हुई कार्रवाई
पीड़ित ग्रामीणों जामदाइया देवी, कुमकुम कुमारी, सीमा देवी, नीतू देवी, सजनी कुमारी, चंद्रमणि पासवान और अशोक पासवान समेत अन्य लोगों ने कार्रवाई को लेकर अपनी नाराजगी जताई है। ग्रामीणों का आरोप है कि रतन सिंह और उनके सहयोगियों की ओर से हाईकोर्ट में दिए गए आवेदन के आधार पर प्रशासन ने यह कार्रवाई की है।
ग्रामीणों का यह भी दावा है कि जिन लोगों ने अतिक्रमण की शिकायत की, उन्होंने खुद भी कथित तौर पर गैरमजरुआ जमीन पर कब्जा कर रखा है। उनका आरोप है कि प्रशासन की कार्रवाई एकतरफा है और शिकायत करने वाले पक्ष के कथित कब्जे पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
"नोटिस के बाद नियमानुसार हुई कार्रवाई"
वहीं प्रशासन की ओर से कहा गया है कि अवैध निर्माण और अतिक्रमण को लेकर संबंधित लोगों को पहले नोटिस जारी किया गया था। इसके बाद नियमानुसार अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई। प्रशासन के मुताबिक कार्रवाई अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया के तहत की गई है। ऐसे में ग्रामीणों के आरोप और प्रशासन के दावे के बीच अब पुनर्वास का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है।
भूमिहीन परिवारों की मांग- पहले मिले जमीन या आवास
प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे भूमिहीन हैं और पिछले कई वर्षों से झोपड़ी बनाकर यहां रह रहे थे। उनका आरोप है कि उनके घरों को हटाने से पहले रहने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई। ग्रामीणों का कहना है कि घर टूटने के बाद उनके पास रहने के लिए सुरक्षित जगह नहीं बची है। खासकर बारिश के मौसम में बच्चों और बुजुर्गों के साथ रहने की चिंता उन्हें परेशान कर रही है।
पीड़ित परिवारों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि बेघर हुए परिवारों के लिए तत्काल जमीन या वैकल्पिक आवास की व्यवस्था की जाए। अब सवाल यही है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद इन परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था कब होगी और उन्हें सिर छिपाने के लिए छत कब मिलेगी।
(वीरेंद्र कुमार की रिपोर्ट)

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