झारखंड का एक अनोखा मंदिर... जहां प्रसाद के रुप में चढ़ाया जाता है घोड़ा !
झारखंड के सरायकेला में स्थित घोड़ा बाबा मंदिर अपने आप में एक अनोखा है. इस मंदिर में किसी देवी-देवता या भगवान की पूजा नहीं होती है बल्कि घोड़ा की पूजा अर्चना की जाती है. और प्रसाद के रुप में भी घोड़ा ही चढ़ाया जाता है. पढ़ें पूरी खबर...

Jharkhand (Saraikela): देश में कई प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर है जिसकी अपनी-अपनी अलग मान्यताएं है. कुछ ऐसी ही वर्षों पुरानी एक मंदिर झारखंड के सायकेला में है जिसकी अपनी एक अलग मान्यता है. अगर आप इस मंदिर की कहानी सुनेंगे तो आश्चर्यचकित हो जाएंगे. दरअसल, इस मंदिर में किसी भगवान या देवी-देवता की नहीं बल्कि घोड़े की पूजा-अर्चना की जाती है. पूजा की यह प्रथा पिछले 300 वर्षों से चली आ रही है. मंदिर में प्रसाद के रूप में भी घोड़ा ही चढ़ाया जाता है ! हो गए ना, आप आश्चार्यचकित...
हर मनोकामनाएं होती है पूरी
आपको बता दें, यह मंदिर झारखंड के सरायकेला जिले के गम्हरिया प्रखंड (ब्लॉक) के स्थित है. मंदिर का नाम घोड़ा बाबा मंदिर है जो जमशेदपुर से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर सरायकेला मार्ग पर गम्हरिया के पास सड़क के किनारे हैं. मान्यता है कि इस मंदिर में जो भी भक्त अपनी इच्छाएं और मनोकामनाएं मांगते हैं वो पूर्ण होती है और जब उनकी मन्नते पूरी हो जाती है तो वे मंदिर में प्रसाद के रुप में घोड़ा चढ़ाते है. लेकिन यह घोड़ा असली का नहीं होता है बल्कि मिट्टी का बना होता है. 
मन्नते लिये दूर-दूर से मंदिर पहुंचते हैं श्रद्धालु
मकर संक्रांति के एक दिन बाद यानी मकर संक्रांति के दूसरे दिन मंदिर में काफी भीड़ होती है. इस मंदिर में वर्ष में एक बार ही 'मकर संक्रांति' श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है लोग दूर-दूर से घोड़ा बाबा मंदिर पहुंचते है और भक्ति में इतने लीन हो जाते है कि आसपास का पूरा वातावरण भी भक्तिमय हो जाता है. वे अपनी मन्नते लेकर मंदिर पहुंचते हैं और पूजा-पाठ करते हैं. अभी मकर संक्रांति निकट है और ऐसे में श्रद्धालु अभी से मंदिरों में आने लगे है. लेकिन सड़क पर भीड़ और पूजन के दौरान ट्रैफिक व्यवस्था से मंदिर चिरमिराई रहती है मिट्टी के घोड़े चढ़ाने से श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण होने पर सीमेंट-बालू के बने घोड़े का दान भी लोग करते है. जिसकी तैयारी जोरों पर है मंदिर में साफ सफाई और रंग रोकन का कार्य भी तेज से चल रहा है.
मकर संक्रांति के दूसरे दिन लगता है श्रद्धालुओं का हुजूम
मंदिर की प्राचीनता की जानकारी देते हुए मंदिर कमिटी मेंबर छोटूराम दास ने बताया कि मंदिर में किसी भगवान या देवी देवता की नहीं बल्कि घोड़ा बाबा की आराधना और पूजा-अर्चना की जाती है. साल में एक बार मकर संक्रांति के दूसरे दिन मंदिर में श्रद्धालुओं का हुजूम दूर-दूर से घोड़ा बाबा मंदिर दर्शन के लिए पहुंचता है. सभी श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं घोड़ा बाबा मंदिर के समक्ष प्रस्तुत करते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण भी होती है. 
जानें घोड़ा बाबा मंदिर की पौराणिक कथा
मन्दिर में घोड़े की पूजा की प्रथा 300 साल पुरानी है प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण और बलराम ने घोड़े पर सवार होकर खेती के लिए इस ग्राम का दौरा किया था और फिर बलराम ने अपने हल से गम्हरिया की धरती पर खेती की नींव रखी थी. जिसके बाद भगवान कृष्ण और बलराम गांव से चले गए लेकिन उनका घोड़ा गम्हरिया में ही रह गया. तभी से गम्हरिया में घोड़ा बाबा की पूजा-अर्चना बड़े ही भक्ति भाव के साथ की जा रही है. कालान्तर में यहां पूजा की अद्भुत प्रथा प्रचलित हुई और लोग घोड़ा बाबा को उन्हीं की प्रति कृति चढ़ाने लगे. जानकारी के अनुसार, वर्तमान मन्दिर का निर्माण 300 वर्षों पूर्व हुआ माना जाता है.
रिपोर्ट- चंद्रशेखर









