देश के हर प्रमुख मंदिरों में त्योहारों की धूम जोरों की रहती है. मध्य प्रदेश के महाकालेश्वर मंदिर में भी होली धूमधाम से मनाया जाता है. इस बार फाल्गुन की पूर्णिमा पर होली के साथ चंद्र ग्रहण ने भी दस्तक दी है. जिससे त्योहारों की रौनक थोड़ी फीकी होती नजर आ रही है. हम इस मौके पर मध्य प्रदेश के महाकालेश्वर मंदिर की ग्रहण के दौरान की प्रक्रियाओं की बात करेंगे.
आमतौर पर ग्रहण के समय देशभर के मंदिरों के द्वार बंद कर दिए जाते हैं, घरों में भी पूजा-अर्चना रोक दी जाती है और सूतक काल का पालन किया जाता है. ग्रहण समाप्त होने के बाद ही शुद्धि के साथ दोबारा पूजा शुरू होती है लेकिन उज्जैन स्थित बाबा महाकाल की नगरी में परंपरा कुछ अलग है. यहां श्री महाकालेश्वर मंदिर में ग्रहण के दौरान भी नियमित रूप से दर्शन होते हैं. मान्यता है कि स्वयंभू ज्योतिर्लिंग होने के कारण बाबा महाकाल पर ग्रहण का प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिए मंदिर के पट बंद नहीं किए जाते और भक्त निर्बाध रूप से दर्शन कर पाते हैं.
श्री महाकालेश्वर मंदिर में चंद्रग्रहण पर भी व्यवस्थाएं सामान्य रहेंगी. हर रोज की तरह आज सुबह भी भस्म आरती हुई. रात की शयन आरती तक श्रद्धालु दर्शन कर सकेंगे. मंदिर के रमन गुरु के अनुसार, यह ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी है. दक्षिण दिशा काल की मानी जाती है और जो काल पर भी अधिपति हों, वही महाकाल कहलाते हैं. ऐसी मान्यता है कि जहां स्वयं महाकाल विराजमान हों, वहां ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है. इसी कारण ग्रहण काल में भी यहां पूजा-अर्चना और आरती का क्रम निर्बाध जारी रहता है.
हर रोज की तरह हुई भस्म आरती
दरअसल मंगलवार को ग्रहण होने से उज्जैन में कई मंदिरों के पट नहीं खुलेंगे ओर कुछ में खुलेंगे, तो भगवान का स्पर्श नहीं किया जा सकेगा. हालांकि महाकाल मंदिर के पट मंगलवार तड़के चार बजे ही खुले. प्रतिदिन अनुसार भस्म आरती हुई. इसके बाद ग्रहण होने के कारण आम श्रद्धालु बाबा के दूर से दर्शन तो करते हुए नजर आए लेकिन गर्भगृह में मंदिर के पुजारी भी नहीं जा सके. वजह ग्रहण के कारण सूतक लगना है, इसलिए ग्रहण खत्म होने के बाद ही बाबा को जल अर्पित किया जा सकेगा. इस दौरान बाबा भक्तों को दर्शन देंगे.








