कुएं के बगल से गुजरते हैं मासूम, न सड़क है न बिजली!, बोकारो के वीरटांड स्कूल में जान जोखिम में डालकर पढ़ाई
झारखंड में स्कूली शिक्षा के स्तर को सुधारने और बच्चों को आधुनिक सुविधाएं देने के सरकारी दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर इन दावों का सच कुछ और ही नजर आता है।


Bokaro: झारखंड में स्कूली शिक्षा के स्तर को सुधारने और बच्चों को आधुनिक सुविधाएं देने के सरकारी दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर इन दावों का सच कुछ और ही नजर आता है। बोकारो के पिंडराजोड़ा इलाके में पड़ने वाले नव प्राथमिक विद्यालय वीरटांड (चास-02) की हालत देखकर कोई भी हैरान रह जाएगा। यहां पढ़ने वाले नन्हे बच्चों के लिए स्कूल की दहलीज तक पहुंचना ही किसी बड़ी जंग जीतने जैसा है।
खेतों की संकरी मेड़ और खुला कुआं
इस स्कूल तक जाने के लिए बच्चों को खेतों के बीच से होकर गुजरना पड़ता है। पक्की सड़क न होने की वजह से छोटे-छोटे बच्चे खेतों की संकरी मेड़ पर संतुलन बनाकर चलते हैं। सबसे डराने वाली बात यह है कि रास्ते में एक बड़ा और गहरा कुआं मौजूद है, जिसके बिल्कुल किनारे से होकर ये नन्हे-मुन्ने रोजाना गुजरते हैं। जरा सी चूक किसी बड़े और जानलेवा हादसे का सबब बन सकती है, जिसे लेकर परिजनों के दिल में हमेशा डर बना रहता है।
कीचड़ में फिसलते कदम और गुमसुम बचपन
बरसात के दिनों में यहां के हालात और भी ज्यादा बदतर हो जाते हैं। कच्चा रास्ता पूरी तरह कीचड़ और पानी से लथपथ हो जाता है, जिससे बच्चों के पैर फिसलने का खतरा दोगुना हो जाता है। स्कूल के प्रभारी प्रधानाध्यापक का कहना है कि रास्ते की दिक्कत तो है ही, साथ ही आज तक इस विद्यालय में बिजली का कनेक्शन तक नहीं पहुंच सका है। उमस भरी गर्मी में बच्चे बिना पंखे के पसीने से तर-बतर होकर पढ़ने को मजबूर हैं।
सिर्फ आश्वासनों का झुनझुना, समाधान कब?
प्रभारी प्रधानाध्यापक ने बताया कि स्कूल में बिजली लगवाने के लिए संबंधित विभाग के दफ्तरों में कई बार लिखित आवेदन दिए जा चुके हैं, लेकिन अफसरों की तरफ से सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले हैं, कोई ठोस काम नहीं हुआ। मासूम बच्चों का भी बस यही दर्द है कि उन्हें भी बाकी स्कूलों की तरह बिजली-पंखा मिले और आने-जाने के लिए एक सुरक्षित पक्की सड़क बने। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी फाइलों से निकलकर इन मासूमों की गुहार आखिर कब तक जिम्मेदार अफसरों के कानों तक पहुंचेगी।

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