रांची पुस्तक मेले का समापन आज, कवि सम्मेलन के साथ कई पुस्तकों का हुआ लोकार्पण
आज के डिजिटल युग में पुस्तक हाथ में लिए पढ़ते हुए लोग बहुत कम दिखेंगे. लेकिन इन्हीं पुस्तकों के जरिए मिलने वाले लाभों को बचाए रखने और फैलाने की खातिर हर साल रांची के जिला स्कूल में पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता है. इस वर्ष के इस आयोजन का समापन आज यानी 4 जनवरी को होने वाला है.

RANCHI PUSTAK MELA: जिला स्कूल मैदान में आयोजित दस दिवसीय राष्ट्रीय पुस्तक मेले का रविवार को समापन होगा। समापन से एक दिन पूर्व शनिवार को मेले में पुस्तक प्रेमियों की भारी भीड़ उमड़ी। इस दौरान साहित्य और संस्कृति का संगम देखने को मिला, कई नई पुस्तकों का लोकार्पण और भोजपुरी कवि सम्मेलन मुख्य आकर्षण रहे।

इतिहास गवाह है कि जब-जब ज्ञान को मिटाने की कोशिश की गई, तब-तब सबसे पहले किताबों को निशाना बनाया गया. तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविख्यात शिक्षा केंद्रों में हजारों दुर्लभ ग्रंथों को जलाया गया. क्योंकि आक्रमणकारी जानते थे कि अगर किताबें नष्ट होंगी तो ज्ञान, सोच और सभ्यता कमजोर पड़ जाएगी. लेकिन वे यह भूल गए कि ज्ञान को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता.

आज उसी ज्ञान परंपरा की झलक रांची में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले में देखने को मिल रही है. जिला स्कूल मैदान रांची में लगे इस मेले ने साहित्य और अध्ययन प्रेमियों को एक नया मंच दिया है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक. हर उम्र के पाठकों की भीड़ यह बताती है कि किताबों के प्रति लोगों का लगाव अब भी कायम है. मेले में हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषाओं की किताबें लोगों को आकर्षित कर रही हैं. यह पुस्तक मेला सिर्फ किताबें खरीदने का स्थान नहीं है बल्कि ज्ञान, शिक्षा और संस्कृति का संगम भी है.

दस दिवसीय इस आयोजन में कविता-कहानी पाठ, साहित्यिक चर्चा, चित्रकला, गायन और नृत्य जैसे कार्यक्रमों ने खासकर युवाओं और बच्चों को जोड़ने का काम किया है. स्थानीय कवियों और लेखकों की प्रस्तुतियों ने पढ़ने-लिखने के प्रति उत्साह बढ़ाया है. डिजिटल युग में भी यह साफ है कि स्क्रीन से मिली जानकारी क्षणिक होती है, लेकिन किताबों से मिला ज्ञान स्थायी होता है.

तक्षशिला और नालंदा की राख आज भी यही संदेश देती है कि किताबें जलाई जा सकती हैं, विचार नहीं. रांची का यह पुस्तक मेला उम्मीद जगाता है कि समाज फिर से पढ़ने-लिखने की संस्कृति की ओर लौट रहा है और ज्ञान की यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक मजबूती से आगे बढ़ेगी.
रिपोर्ट: सत्यव्रत किरण/नीरज कुमार









