चतरा में एलपीजी का 'हाहाकार': चूल्हे हुए ठंडे, होटलों के भरोसे सैकड़ों परिवार
एलपीजी गैस की बुकिंग के हफ्ते भर बाद भी उपभोक्ताओं को सिलिंडर की उपलब्धता नहीं हो पा रही. इस गैस की किल्लत के पीछे एजेंसियों द्वारा कालाबाजारी किए जाने की बात की जा रही है.

Chatra Special Report: डिजिटल इंडिया और उज्ज्वला योजना के इस दौर में झारखंड के चतरा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो सरकारी दावों और व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करती है. चतरा में इन दिनों एलपीजी गैस का ऐसा संकट गहराया है कि आम जनता त्राहि-माम कर रही है. स्थिति यह है कि मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के घरों में चूल्हे ठंडे पड़ गए हैं और लोग होटलों से खाना मंगाकर खाने को मजबूर हैं. एक तरफ उपभोक्ता दर-दर भटक रहे हैं, तो दूसरी तरफ गैस की कालाबाजारी का जिन्न एक बार फिर बाहर निकल आया है. आखिर क्यों चतरा के लोग अपनी ही रसोई के लिए 'पत्थर कोयला' और 'लकड़ी' के युग में लौटने को विवश हैं. चतरा जिले में एलपीजी गैस की किल्लत ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है. आलम यह है कि गैस खत्म होने के बाद नया सिलेंडर नहीं मिल पाने से कई घरों में दो वक्त की रोटी तक नहीं बन पा रही है. उपभोक्ताओं में घबराहट का माहौल है और लोग सिलेंडर की तलाश में एक एजेंसी से दूसरी एजेंसी के चक्कर काट रहे हैं. गैस एजेंसियों के फोन या तो बंद मिल रहे हैं या फिर उपभोक्ताओं को संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा रहा. मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए अब होटल से खाना मंगाना मजबूरी बन गई है, जिससे उनकी मेहनत की कमाई पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है.

15 दिनों से गैस के लिए दौड़-धूप कर रहे हैं, लेकिन गैस नहीं मिल रही. पूरा परिवार होटल से खाना मंगाकर खाने को मजबूर है. रसोई में चूल्हा जलना बंद हो गया है, समझ नहीं आता कि आखिर कब तक ऐसे चलेगा. समस्या सिर्फ आपूर्ति की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कालाबाजारी का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है. उपभोक्ताओं का गंभीर आरोप है कि जहां आधिकारिक रूप से बुकिंग करने पर हफ्ते भर तक इंतजार करना पड़ता है, वहीं खुले बाजार में 1100 रुपये तक में सिलेंडर आसानी से उपलब्ध हो रहा है. सवाल यह उठता है कि अगर एजेंसियों के पास स्टॉक नहीं है, तो ब्लैक में बेचने वालों के पास भारी मात्रा में गैस सिलेंडर कहाँ से पहुँच रहे हैं? क्या कुछ बिचौलिये आम जनता की मजबूरी का फायदा उठाकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं?

हफ्ते-हफ्ते भर फजीहत करनी पड़ती है, फिर भी गैस नहीं मिलती. लेकिन वही गैस ब्लैक में 1100 रुपये में बेची जा रही है. लाइन में लगे लोगों को मना कर दिया जाता है, लेकिन महंगे दाम देने वालों को तुरंत गैस मिल जाती है. यह प्रशासन की बड़ी नाकामी है. इस किल्लत पर जब गैस एजेंसी संचालकों से बात की गई, तो उन्होंने इसके पीछे शादी-विवाह के सीजन और रविवार की छुट्टी जैसे तकनीकी बहाने सामने रखे. भारत गैस एजेंसी के संचालक रामप्रवेश और पप्पू गुप्ता का कहना है कि गैस की आपूर्ति हो रही है, लेकिन मांग अधिक होने के कारण वितरण में थोड़ा समय लग रहा है. पप्पू गुप्ता के अनुसार, बीच में रविवार या सोमवार को आपूर्ति बाधित होने से एक-दो दिन का गैप हो जाता है, जिसे जल्द ही दुरुस्त कर लिया जाता है. लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चतरा जिला प्रशासन इस गंभीर समस्या पर संज्ञान लेगा? क्या कालाबाजारी करने वालों पर नकेल कसी जाएगी या फिर चतरा की जनता को यूं ही होटलों के खाने और धुएं वाले चूल्हों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा? गैस की यह किल्लत प्रशासन की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है. अब देखना होगा कि क्या आम जनता को राहत मिलती है या उन्हें वापस कोयला और लकड़ी के सहारे ही जीवन यापन करना होगा.
रिपोर्ट: मो. रिजवान
specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.
Related Posts

उपायुक्त की अध्यक्षता में शासी समिति की बैठक,लिए गए अहम निर्णय

Giridih: टीबड़ेबाल टेक्सटाइल में लगी भीषण आग, घंटों की मशक्कत के बाद पाया गया आग पर काबू






