'जमीन आपकी है तो नोटिफिकेशन दिखाएं!', रांची एयरपोर्ट लैंड डिस्प्यूट में हाईकोर्ट का बड़ा आदेश
रांची एयरपोर्ट के पास जमीन विवाद में झारखंड हाईकोर्ट ने रक्षा मंत्रालय से जमीन पर दावे का आधार और नोटिफिकेशन मांगा है। कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने रांची एयरपोर्ट के निकट स्थित एक बहुचर्चित जमीन विवाद मामले में कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत ने केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) से इस मामले पर जवाब तलब किया है। अदालत ने रक्षा मंत्रालय से स्पष्ट रूप से पूछा है कि वह बताए कि उक्त विवादित जमीन पर उनका दावा किस आधार पर बनता है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि यदि सेना के पास उस जमीन पर अपने अधिकार से संबंधित कोई आधिकारिक नोटिफिकेशन मौजूद है, तो उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
विवादित जमीन पर यथास्थिति बहाल, बिना कोर्ट की इजाजत नहीं होगा निर्माण
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जमीन की स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश भी जारी किया है। अदालत ने विवादित जमीन पर पूरी तरह से यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि अगर सेना उस जमीन पर किसी भी तरह का कंस्ट्रक्शन यानी निर्माण कार्य करना चाहती है, तो इसके लिए उन्हें सबसे पहले अदालत से पूर्व अनुमति और आदेश लेना अनिवार्य होगा। इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने कोर्ट के समक्ष पक्ष रखा।
कागजात हमारे पास, फिर भी सेना ने गाड़ दिया अपना बोर्ड: प्रार्थी
दरअसल यह पूरा मामला नीलिमा प्रसाद द्वारा हाईकोर्ट में दाखिल की गई एक रिट याचिका से जुड़ा है। प्रार्थी की ओर से अदालत को बताया गया कि रांची एयरपोर्ट के पास स्थित खाली जमीन उनकी निजी संपत्ति है। उनके पास इस जमीन का वैध सेल डीड, म्यूटेशन और अप-टू-डेट रेंट रसीद भी उपलब्ध है। इसके बावजूद सेना की ओर से उस जमीन को अपना बताते हुए वहां दावों का बोर्ड लगा दिया गया है। प्रार्थी का कहना है कि उन्हें बेवजह अपनी ही जमीन पर जाने से रोका जा रहा है, जो कि सरासर गलत है।
सेना को जमीन चाहिए तो मुआवजा दे, प्रार्थी ने रखी मांग
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में यह भी दलील दी है कि अगर सेना का उस जमीन पर कोई कानूनी अधिकार बनता है, तो उससे जुड़ा नोटिफिकेशन सामने लाया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने अदालत के सामने यह विकल्प भी रखा कि अगर सेना उस जमीन का उपयोग करना चाहती है या वहां कुछ निर्माण करना चाहती है, तो नियमानुसार उस जमीन का अधिग्रहण किया जाए और उन्हें उचित मुआवजे की रकम का भुगतान किया जाए। अब इस पूरे विवाद में रक्षा मंत्रालय के जवाब पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
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