ना अपराध ही कम हुए ना ही नशे! दुगने हो गए आपराधिक मामले, बिहार की शराबबंदी पर क्यों छिड़ी नई बहस?
बिहार में शराबबंदी के 10 साल पूरे होने के बीच NCAER की रिपोर्ट ने इसकी सफलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध, संभावित राजस्व नुकसान और दूसरे नशीले पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर बहस तेज हो गई है।


बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। 5 अप्रैल 2016 को नीतीश कुमार सरकार ने शराब की बिक्री और सेवन पर पूरी तरह रोक लगाने का फैसला लिया था। उस वक्त इस कदम को महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा में कमी और सामाजिक बदलाव से जोड़कर देखा गया था। लेकिन एक दशक बाद शराबबंदी की सफलता और उसके असर को लेकर बहस फिर से तेज हो गई है।
इसी बीच इंडिया पॉलिसी फोरम में पेश की गई नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक रिपोर्ट ने बिहार में पूर्ण शराबबंदी को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में शराबबंदी को खत्म करने की सिफारिश किए जाने की बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, शराबबंदी अपने प्रमुख उद्देश्यों को हासिल करने में पूरी तरह सफल नहीं रही और इसके साथ अवैध शराब तथा दूसरे नशीले पदार्थों की समस्या भी चिंता का विषय बनी हुई है।
महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर शराबबंदी कितनी सफल?
शराबबंदी लागू करने के पीछे सरकार का एक बड़ा तर्क महिलाओं को शराब से जुड़ी हिंसा और घरेलू परेशानियों से राहत दिलाना का था। लेकिन अब सामने आए आंकड़ों ने इस दावे पर बहस को फिर हवा दे दी है।2016 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 12 हजार मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर करीब 28 हजार तक पहुंच गई।
हालांकि, इन आंकड़ों के आधार पर यह सीधे कहना बिल्कुल सही नहीं होगा कि शराबबंदी के कारण महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़े है। अपराध के आंकड़ों पर कई दूसरे सामाजिक और प्रशासनिक कारणों का भी असर पड़ता है। लेकिन NCAER की रिपोर्ट ने यह सवाल जरूर उठाया है कि शराबबंदी के 10 साल बाद महिलाओं की सुरक्षा के अपने प्रमुख लक्ष्य को किस हद तक हासिल किया जा सका। यही वजह है कि अब शराबबंदी की सामाजिक उपयोगिता को लेकर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है।
शराब बंद हुई, लेकिन क्या नशा कम हुआ?
शराबबंदी की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह भी है कि शराब की उपलब्धता कम होने के बाद कुछ लोग दूसरे नशीले पदार्थों की तरफ बढ़े. NCAER की रिसर्च में दावा किया गया है कि शराब की जगह सिंथेटिक ड्रग्स, नशीली गोलियों और कफ सिरप जैसे दूसरे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ा है. अगर ऐसा है तो यह सरकार के लिए और बड़ी चुनौती है. क्योंकि सवाल सिर्फ शराब रोकने का नहीं रह जाता. सवाल ये बन जाता है कि क्या शराब की जगह उससे भी ज्यादा खतरनाक नशे ने ले ली है? यानी शराबबंदी ने नशे की समस्या खत्म करने के बजाय उसके स्वरूप को बदल दिया है. ये चिंता अब बहस का बड़ा हिस्सा बन चुकी है.
शराबबंदी का सबसे बड़ा आर्थिक असर सरकारी राजस्व पर भी पड़ा है। दूसरे राज्यों में शराब से मिलने वाला उत्पाद शुल्क सरकारों की आय का बड़ा स्रोत है।
राज्य | उत्पाद राजस्व |
|---|---|
उत्तर प्रदेश | ₹57,722.26 करोड़ |
कर्नाटक | ₹40,183.02 करोड़ |
तेलंगाना | ₹40,209 करोड़ |
महाराष्ट्र | ₹32,575 करोड़ |
सरकार की परेशानी ये है कि एनडीए के अंदर से ही बार बार इस कानून के खिलाफ आवाज उठ रही है. सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग ये कहते हुए की कि दुनिया में कहीं भी शराबबंदी अब तक सफल नहीं रही है. केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान मानते हैं कि शराबबंदी से राजस्व घटा है और राज्य को राजस्व बढ़ाने के नए उपाय ढूंढने ही होंगे, वहीं केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी गुजरात मॉडल की वकालत कर रहे हैं. जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर शराबबंदी को फर्जी कानून बताते हुए आरोप लगाते हैं कि शराबबंदी की आड़ में शराब माफिया और भ्रष्ट तंत्र मिलकर समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं तो नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि बिहार में फोन पर शराब की डिलीवरी की जा रही है.
बिहार की शराबबंदी की बहस अब सिर्फ “शराब बंद रहे या खुले” तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि- क्या शराबबंदी ने महिलाओं की सुरक्षा में अपेक्षित बदलाव किया? क्या शराब की जगह दूसरे नशीले पदार्थों का खतरा बढ़ा? क्या अवैध शराब के कारोबार पर पूरी तरह लगाम लग पाई? और क्या सामाजिक फायदे और आर्थिक नुकसान के बीच बिहार सरकार को अपनी शराब नीति पर दोबारा विचार करना चाहिए?
(मरगूब आलम की रिपोर्ट)

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