Jharkhand (Ranchi): चैत्र महीने के पावन अवसर पर प्रकृति महापर्व सरहुल की तैयारियां पूरे जोरों पर है. पर्व से एक दिन पहले आदिवासी समाज के लोग अपने पारंपरिक अखड़ा स्थल में एकत्र होकर सरना धर्म के अनुसार पूरे विधि-विधान के साथ प्रकृति और वन-देवताओं की पूजा-अर्चना कर रहे हैं. इस पर्व में प्रकृति को धन्यवाद देने की परंपरा रही है, जिसे आदिवासी संस्कृति की पहचान माना जाता है. बताते चलें कि इस साल का सरहुल पर्व 21 मार्च को मनाया जाएगा.
वहीं आज सरना अखड़ा स्थल पर पांच गांव के लोगों ने एक साथ मां सरना की परिक्रमा की और अच्छी वर्षा व समृद्ध कृषि की कामना की. पूजा के दौरान कई पारंपरिक नियमों का पालन किया गया, जिनका सीधा संबंध प्रकृति से होता है. इनमें घड़े में पानी रखकर उसके स्तर से आने वाले वर्षा के अनुमान लगाने की परंपरा भी शामिल है.
इसके साथ ही पारंपरिक रूप से मुर्गे की बलि भी दी जाती है. सरहुल पर्व आदिवासी समाज के प्रकृति प्रेम, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है.
सरहुल झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की जनजातियों (उरांव, मुंडा, हो, संथाल) द्वारा वसंत ऋतु (चैत्र शुक्ल तृतीया) में मनाया जाने वाला प्रमुख प्रकृति पर्व है. यह नए साल की शुरुआत, साल वृक्ष की पूजा और धरती-सूर्य के विवाह का प्रतीक है. इस दौरान सखुआ के फूलों की पूजा की जाती है और मांदर-नगाड़ों के साथ नाच-गाना होता है.

सरहुल मध्य-पूर्व भारत के आदिवासी समुदायों का एक प्रमुख पर्व है, जो झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाता है. इस पर्व को मुख्य रूप से मुण्डा, भूमिज, हो, संथाल और उरांव आदिवासियों द्वारा मनाया जाता है, और यह उनके महत्वपूर्ण उत्सवों में से एक है.
यह उत्सव चैत्र महीने के तीसरे दिन, चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है. यह नए साल की शुरुआत की निशानी है. हालांकि इस त्योहार की कोई निश्चित तारीख नहीं होती क्योंकि विभिन्न गांवों में इसे विभिन्न दिनों पर मनाया जाता है. इस वार्षिक उत्सव को बसंत ऋतु के दौरान मनाया जाता है और इसमें पेड़ों और प्रकृति के अन्य तत्वों की पूजा शामिल होती है. इस समय, साल (शोरिया रोबस्टा) के पेड़ों में फूल आने लगते हैं. झारखंड में इस दिन को एक राजकीय अवकाश घोषित किया गया है.

कुछ इस तरह होती है 'सरहुल पूजा'
त्योहार के दौरान साल के फूलों, फलों और महुआ के फलों को जायराथान या सरनास्थल पर लाए जाते हैं. जहां पाहन (पुजारी) और देउरी (सहायक पुजारी) जनजातियों के सभी देवताओं की पूजा करते हैं. "जायराथान" पवित्र सरना वृक्ष का एक समूह है, जिनकी आदिवासियों में विभिन्न अवसरों में पूजा होती है. यह ग्राम देवता, जंगल, पहाड़ तथा प्रकृति की पूजा है. जिसे जनजातियों का संरक्षक माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि नए फूल तब दिखाई देते हैं जब लोग गाते और नृत्य करते हैं. देवताओं की साल और महुआ के फलों और फूलों के साथ पूजा की जाती है. आदिवासी भाषाओं में साल (सखुआ) वृक्ष को 'सारजोम' कहा जाता है.
देवताओं की पूजा करने के बाद, गांव के पुजारी (लाया या पाहन) एक मुर्गी के सिर पर कुछ चावल डालते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि मुर्गी भूमि पर गिरने के बाद चावल के दानों को खाती है, तो इसे लोगों के लिए समृद्धि की भविष्यवाणी के रूप में माना जाता है. लेकिन अगर मुर्गी उन दानों को नहीं चुगती, तो इसे आने वाली आपदा का प्रतीक माना जाता है. इसके अलावा, आने वाले मौसम में पानी में टहनियों की एक जोड़ी देखते हुए वर्षा की भविष्यवाणी की जाती है. ये उम्र पुरानी परंपराएं हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं.

झारखंड में सभी जनजाति इस उत्सव को महान उत्साह और आनन्द के साथ मनाते हैं. जनजातीय पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी पारंपरिक परिधान धारण करते हैं, और सभी पारंपरिक नृत्य में भाग लेते हैं. वे स्थानीय रूप में चावल से बनाये गये 'हड़िया' पीते हैं. आदिवासी पीसे हुए चावल और पानी का मिश्रण अपने चेहरे पर और सिर पर मलते हैं और साल के फूल भी लगाते हैं, और फिर जायराथान के आखड़ा में नृत्य करते हैं.
हालांकि एक आदिवासी त्योहार होने के बावजूद, सरहुल भारतीय समाज के किसी विशेष भाग के लिए प्रतिबंधित नहीं है. अन्य समुदाय जैसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई सभी नृत्य आदि में भाग लेते हैं. सरहुल सामूहिक उत्सव का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां हर कोई प्रतिभागी है. आदिवासी मुंडा, भूमिज, कोल, हो और संथाल लोग इस त्योहार को हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं.
सरहुल मात्र आदिवासियों द्वारा मनाया जाने वाला एक पारंपरिक त्योहार नहीं है. यह हमें प्रकृति के संरक्षण की प्रेरणा देता है, हमें प्रकृति से भावनात्मक जुड़ाव और इससे जुड़कर रहने की सीख भी देता है.









