World Women's Day पर 'Pink Auto चालकों' की कहानी- आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और संघर्ष की देती हैं गवाही
रांची की ‘पिंक ऑटो’ सेवा महिला सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की प्रेरक पहल है. 2013 में शुरू हुई इस पहल ने रीना देवी और सुमन देवी जैसी महिलाओं को रोजगार दिया, जिन्होंने ऑटो चलाकर परिवार संभाला, बच्चों को पढ़ाया और समाज की रूढ़ियों को तोड़ा.

World Women's Day: रांची में महिला दिवस पर 'पिंक ऑटो' की कहानी साहस और आत्मनिर्भरता की मिसाल है. स्वयंसेवी संगठन ने ऐसे महिलाओं को सम्मानित किया है. 2012 के दिल्ली कांड के बाद महिला सुरक्षा के लिए शुरू की गई इस सेवा के तहत, राजधानी की सड़कों पर महिलाओं के लिए, महिलाओं द्वारा ही संचालित पिंक ऑटो उतारे गए. रीना देवी जैसी कई महिलाओं ने ऑटो चलाकर रूढ़ियों को तोड़ा और स्वरोजगार अपनाया.
पिंक ऑटो रांची की महिलाओं के लिए सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि सम्मान और आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया. जो आज भी अपने अस्तित्व के संघर्ष के बावजूद आत्मनिर्भरता की एक प्रेरणादायक कहानी बयां करती हैं.
रांची के विभिन्न रूटों पर चल रहे पिंक ऑटो महिला यात्रियों की पहली पसंद बन चुके हैं. महिलाओं का मानना है कि इसमें यात्रा करना सुरक्षित है और किसी तरह की असुविधा नहीं होती. महिला यात्रियों ने भी पिंक ऑटो चलाने वाली महिलाओं के हौसले की सराहना की और कहा कि परिस्थितियों ने इन्हें मजबूर किया, लेकिन मेहनत और लगन से इन्होंने समाज को नया संदेश दिया है. निस्संदेह, ये महिलाएं इस बात की मिसाल हैं कि चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, आत्मनिर्भरता और हौसला हर चुनौती पर जीत दिला सकता है.
उद्देश्य
2012 के निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 2013 में रांची में पिंक ऑटो सेवा शुरू की गई थी. ये महिला चालक 'पिंक ऑटो वाली दीदी' के रूप में अपनी एक अलग पहचान बना रही हैं, जो रूढ़ियों को तोड़कर पुरुष-प्रधान क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं.
सुरक्षित सफर
आम यात्रियों, विशेषकर महिलाओं और युवतियों के लिए, पिंक ऑटो एक सुरक्षित और भरोसेमंद वाहन बन गया है, जो शहर में महिलाओं को बिना किसी डर के यात्रा करने का आत्मविश्वास देता है.
सम्मान और प्रोत्साहन
अक्सर महिला दिवस या विभिन्न आयोजनों पर इन महिला चालकों को सम्मानित भी किया जाता है, जिससे उनके हौसले को नई उड़ान मिलती है.
चुनौतियां: इस सफर में उन्हें कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है, जैसे कि पुरुष यात्रियों को बिठाने की मजबूरी, तय रूट की पाबंदी, और कभी-कभी यात्रियों की कमी.
संघर्ष की कहानी इन ऑटो महिलाओं की है. उम्र करीब साठ साल और बीते 10 वर्षों से ऑटो चला रही सुमन देवी ने कहा कि मेरा बेटा ऑस्ट्रेलिया में होटल में काम करता है. बैंक से लोन लेकर उसे मैंने होटल मैनेजमेंट का कोर्स इसी ऑटो को चलाकर कराया. वहीं ऑटो चालक रीना देवी बताती हैं कि मेरे दो बच्चे हैं. बेटा बीटेक कर रहा है वहीं बेटी डी फार्मा कर रही है.
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