एक हाथ में चप्पल, दूसरे में बैग और कमर तक पानी!, कोडरमा के इकलौते टीचर का जज्बा देख करेंगे सलाम
शिक्षक दिवस के मौके पर आज बात एक ऐसे गुरु की, जिनके लिए पढ़ाना सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य को संवारने की दीवानगी है।
Naxatra Digitial Desk: शिक्षक दिवस के मौके पर आज बात एक ऐसे गुरु की, जिनके लिए पढ़ाना सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य को संवारने की दीवानगी है। यह प्रेरणादायक कहानी है कोडरमा जिले के जरगा पंचायत स्थित उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय सपहा के शिक्षक ब्रह्मदेव शर्मा की। वे पिछले 19 सालों से घने जंगलों और उफनती नदी को पार करके सुदूर गांव के बच्चों तक शिक्षा का अलख जगा रहे हैं।
एक हाथ में चप्पल, दूसरे में बैग और कमर तक पानी
घने जंगलों के बीच बसे इस गांव तक पहुंचने की राह बेहद कठिन है। रास्ते में 'वृंदाहा' नदी पड़ती है, जो बरसात के दिनों में विकराल रूप ले लेती है और पूरा गांव टापू बन जाता है। लेकिन यह खौफनाक मंजर भी ब्रह्मदेव शर्मा के कदम नहीं रोक पाता। वे हर सुबह बाइक से 18 किलोमीटर दूर स्कूल के लिए निकलते हैं। नदी किनारे पहुंचकर वे अपने कपड़े बदलकर हाफ पैंट पहनते हैं, एक हाथ में जूते और दूसरे हाथ में बैग थामकर कमर तक गहरे और तेज बहाव वाले पानी में उतर जाते हैं।

स्कूल के इकलौते टीचर, एक दिन की छुट्टी से रुक जाएगी पढ़ाई
ब्रह्मदेव शर्मा अपने स्कूल के इकलौते शिक्षक हैं। यानी अगर वे एक दिन भी स्कूल न पहुंचे, तो पूरे गांव के दर्जनों बच्चों की पढ़ाई ठप हो जाएगी। इसी जिम्मेदारी का एहसास उन्हें हर दिन खतरनाक नदी पार करने की ताकत देता है। भारी बारिश के मौसम में जहां लोग घरों से निकलने में कतराते हैं, वहीं वे बिना नागा किए अपने ड्यूटी पर तैनात मिलते हैं।

"यह सिर्फ नौकरी नहीं, बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी है"
मास्टर साहब का कहना है कि बरसात के तीन महीने स्कूल पहुंचना काफी खतरनाक होता है और छुट्टी लेना बहुत आसान विकल्प है। लेकिन वे इसे सिर्फ एक नौकरी नहीं मानते। उनका साफ कहना है कि "अगर मैं ही हार मान जाऊंगा और स्कूल नहीं पहुंचूंगा, तो इन मासूम बच्चों का भविष्य अंधेरे में चला जाएगा।" ब्रह्मदेव शर्मा का यही जज्बा साबित करता है कि जहां रास्ते खत्म हो जाते हैं, वहीं से एक सच्चे शिक्षक की जिम्मेदारी शुरू होती है।

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