Ramzan 2026: आज इस्लाम के सबसे पवित्र महीने रमजान की 21वीं तारीख है. 40 हिजरी को (अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 27 जनवरी 661) आज के ही दिन हजरत अली शहीद हुए थे.
रिवायतों में उनकी बेटी जैनब बताती हैं कि रात भर बाबा (हजरत अली) बेचैन रहे. 18 रमजान की रात बाबा ने नमक और रोटी से रोजा इफ्तार किया. रात भर इबादत करते रहे. बार बार आंगन में जाते और आसमान को देखते. 19 रमजान को फज्र (सुबह) की नमाज पढाने के लिए कूफा (जो अब इराक में है) की मस्जिद पहुंचे.
मस्जिद में मुंह के बल मुल्जिम बिन अब्दुर्रहमान नाम का एक शख्स, जो कि मुस्लिम ही था, सोया हुआ था. उसे हजरत अली ने नमाज के लिए जगाया और पूछा कि तुम्हारी तबियत तो ठीक है, लेकिन वह सोने का नाटक करता रहा, क्योंकि उसके मंसूबे कुछ और ही थे. फिर हजरत अली नमाज पढाने के लिए खडे हो गए. मुल्जिम एक खम्भे के पीछे जहर बुझी तलवार लेकर छिप गया.
हजरत अली ने नमाज पढानी शुरू की. जैसे ही नमाज के दौरान सजदे के लिए उन्होंने अपना सिर जमीन पर टेका, मुल्जिम ने तलवार से उनके सिर पर वार कर दिया. तलवार की धार हजरत अली के दिमाग तक उतर गई. जहर पूरे जिस्म में फैल गया. तलवार सिर पर लगते ही मौला अली ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड कर एलान किया कि काबे के रब की कसम, मैं कामयाब हो गया.
दो दिन बाद 21 रमजान को वह मनहूस घडी आई, जब हजरत अली इस दुनिया से रुखसत हो गए. मुल्जिम के बारे में कहा जाता है कि उसने यह हमला अमीर मुआविया के कहने पर किया था, जो हजरत अली के खलीफा बनाए जाने के खिलाफ था. जब मुल्जिम को उनके सामने लाया गया तो उन्होंने उसे माफ कर दिया.
मुआविया की दुश्मनी हजरत अली की मौत के बाद भी नहीं रुकी. उनके बाद उनके बडे बेटे हजरत हसन को जहर देकर मार दिया गया और फिर कर्बला में उनके छोटे बेटे हजरत हुसैन को उनके सहाबों (अनुयायियों) के साथ शहीद कर दिया गया, जिसमें छोटे छोटे बच्चे, बुजुर्ग और औरतें भी शामिल थीं.
हजरत अली की खासियत यह रही कि वे एकमात्र ऐसे मुसलमान हैं जो काबे में पैदा हुए और शहादत मस्जिद में पाई. हजरत अली पैगंबर मोहम्मद के चचेरे भाई और सबसे बडे दामाद थे. शिया मुसलमान उन्हें अपना पहला इमाम मानते हैं, जबकि सुन्नी मुसलमान उन्हें अपना चौथा खलीफा मानते हैं.
वे एक वीर योद्धा थे. उन्होंने जंग ए बद्र, जंग ए ओहद, जंग ए खैबर, जंग ए खंदक, जंग ए सिफिन और जंग ए जमल जैसी जंगों में बहादुरी से लडाई की. उन्होंने खैबर की जंग में खैबर के किले के दरवाजे को उखाड कर अपनी ढाल की तरह इस्तेमाल किया था. अपनी इसी जांबाजी के कारण वे शेर ए खुदा की उपाधि से जाने जाते हैं.
हजरत अली को पहला मुस्लिम वैज्ञानिक भी माना जाता है, क्योंकि वह आम लोगों तक विज्ञान से जुडी जानकारियां बहुत ही रोचक ढंग से पहुंचाया करते थे. हजरत अली की नसीहतों को नहजुल बलागा किताब में संकलित किया गया है. इन्हें हजरत अली के कौल के नाम से भी जाना जाता है.
लेख: निलय सिंह






