World Women's Day: विश्व महिला दिवस- एक ऐसा दिन जो नारी शक्ति की एहमियत दुनिया को महसूस कराता है. जिस दिन नारी सशक्तिकरण के मंत्र को दोहराया जाता है. हमें नारी शक्ति पर बात करने की बजाए इसे बढ़ावा देने, महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने, उन्हें आत्मनिर्भरता सिखाने, समाज की बेड़ियों से मुक्ति देने की ओर विचार करना चाहिए. भारत की ही सिर्फ यदि बात करें तो इतिहास में दर्ज ऐसे अनेक नाम मिल जाएंगे, जिनके कारण नारी शक्ति का लोहा पूरे समाज ने माना.
रानी लक्ष्मीबाई
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने ऐसे समयकाल में अपने बलबूते नारी शक्ति का परचम लहराया था, जब स्त्रियों को घर से अकेले निकलने तक की मनाही होती थी. अल्पआयु में उन्हें झांसी के राजा के साथ विवाह बंधन में बांध दिया गया था. जिनकी उम्र रानी लक्ष्मीबाई के लगभग तिगुनी थी. जब राजा का देहान्त हो गया, तो अंग्रेजी सरकार ने राजपाट पर कब्जा करना चाहा. जिसका पुरजोर विरोध करने के साथ अपने युद्ध कौशल से अंग्रेजी सेना को दांतों तले चने चबाने पर मजबूर कर दिया था रानी लक्ष्मीबाई ने.

सावित्रीबाई फुले
भारत की पहली महिला शिक्षिका. उन्होंने समाज के भारी विरोध के बावजूद 1848 में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला और महिलाओं की शिक्षा व अधिकारों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. यह कार्य आज के समय भी प्रासंगिकता रखता है. ग्रामीण परिवेश की बात करें तो आज भी लड़कियों को उनके माता-पिता द्वारा पढ़ाने के उद्देश्य से बढ़ावा नहीं दिया जाता.

कल्पना चावला
अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला. हरियाणा के एक छोटे से शहर से नासा तक का उनका सफर करोड़ों युवाओं के लिए सपनों को सच करने की प्रेरणा है. कल्पना चावला की दूसरी उड़ान, एसटीएस-107, सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में पदार्थों और आग के व्यवहार से संबंधित कई वैज्ञानिक जांचों पर केंद्रित थी. दुखद रूप से, 2003 में कोलंबिया रॉकेट के दुर्घटनाग्रस्त होने के दौरान पृथ्वी के पुनः वायुमंडल में प्रवेश करते समय उनकी और छह अन्य चालक दल के सदस्यों की मृत्यु हो गई. उनकी विरासत आज भी कई लोगों, विशेष रूप से विज्ञान और इंजीनियरिंग क्षेत्र की महिलाओं को प्रेरित करती है, और अंतरिक्ष अन्वेषण और प्रौद्योगिकी में उनके उल्लेखनीय योगदान को उजागर करती है. कल्पना चावला को न केवल एक अंतरिक्ष यात्री के रूप में उनकी उपलब्धियों के लिए याद किया जाता है, बल्कि बाधाओं को तोड़ने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श बनने के लिए भी याद किया जाता है.

अरुणिमा सिन्हा
एक राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी, जिन्हें लुटेरों ने ट्रेन से नीचे फेंक दिया था और उन्होंने अपना पैर गंवा दिया. लेकिन अपनी हिम्मत से वह 2013 में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली महिला दिव्यांग बनीं. अप्रैल 2011 में, सीआईएसएफ भर्ती परीक्षा के लिए दिल्ली जाते समय, सिन्हा को चलती ट्रेन से लुटेरों ने तब फेंक दिया जब उन्होंने उनकी सोने की चेन छीनने की कोशिश का विरोध किया. वह कई घंटों तक पटरियों पर पड़ी रहीं और दर्जनों ट्रेनें उनके पैर के ऊपर से गुजरीं, जिसके परिणामस्वरूप एम्स में उनके घुटने के नीचे से पैर काटना पड़ा. अस्पताल में रहते हुए ही उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ने का संकल्प लिया ताकि यह साबित कर सकें कि विकलांगता उनके सपनों को सीमित नहीं कर सकती.
इन्दिरा गांधी
भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री (अब तक). उन्हें 'आयरन लेडी' के नाम से जाना जाता है. उन्होंने 1971 के युद्ध और हरित क्रांति जैसे कड़े फैसलों से भारत की दिशा बदलकर रख दी.
"मैं पुरुष नहीं, स्त्री हूं"
इंदिरा गांधी को अक्सर उनकी कठोर निर्णय लेने की क्षमता के कारण उनके मंत्रिमंडल का "एकमात्र पुरुष" कहा जाता था. एक इंटरव्यू में जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही खूबसूरती से जवाब दिया था- "मैं इसे अपना अपमान मानती हूं. नेतृत्व के लिए मुझे पुरुष कहलाने की जरूरत क्यों है? मैं एक स्त्री हूं और अपनी स्त्री शक्ति के साथ ही नेतृत्व करती हूं." यह बयान आज भी महिला नेतृत्व के लिए एक बड़ी मिसाल है.









