"सरकारी अफसर की गलती की सजा अभ्यर्थी क्यों भुगते?", JPSC को करारा झटका, हाईकोर्ट ने दिया चंचला को अफसर बनाने का आदेश
JPSC सिविल सेवा परीक्षा में 590 अंक पाने के बावजूद जाति प्रमाणपत्र में पति का नाम होने से बाहर हुईं चंचला कुमारी को हाईकोर्ट ने नियुक्ति का आदेश दिया।

Jharkhand High Court : झारखंड हाईकोर्ट ने 7वीं से 10वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से जुड़े एक बेहद अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए अभ्यर्थी चंचला कुमारी को बड़ी राहत दी है। जाति प्रमाणपत्र में पिता के स्थान पर पति का नाम दर्ज होने के आधार पर झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) ने उन्हें चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया था। अदालत ने JPSC के इस फैसले को पूरी तरह खारिज करते हुए आयोग को 8 सप्ताह के भीतर नियुक्ति की अनुशंसा करने और राज्य सरकार को अगले 4 सप्ताह के भीतर चंचला कुमारी को नियुक्ति पत्र जारी करने का सख्त निर्देश दिया है।
कटऑफ से ज्यादा अंक, फिर भी आयोग ने किया बाहर
चंचला कुमारी ने JPSC की 2021 की सिविल सेवा परीक्षा में अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के तहत भाग लिया था। उन्होंने प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा दोनों में शानदार सफलता हासिल की और साक्षात्कार तक पहुंचीं। चंचला को कुल 590 अंक मिले थे, जबकि SC वर्ग का अंतिम कटऑफ 583 अंक था। यानी उनके अंक अंतिम चयनित उम्मीदवार से भी काफी अधिक थे। इसके बावजूद JPSC ने परिणाम जारी करते समय उनका नाम सूची से बाहर कर दिया और तर्क दिया कि दस्तावेज सत्यापन के समय जमा किया गया जाति प्रमाणपत्र पिता के बजाय पति के नाम पर आधारित था।
अधिकारी की चूक की सजा अभ्यर्थी को नहीं दी जा सकती
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपक रौशन की अदालत ने पाया कि चंचला कुमारी ने 4 जनवरी 2019 को ही जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदन कर दिया था। इसके बाद कोडरमा के तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) ने 27 मार्च 2019 को प्रमाणपत्र जारी किया, जिसमें पति का नाम दर्ज था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सरकारी अधिकारी ने नियमानुसार पिता के नाम पर प्रमाणपत्र जारी करने में प्रशासनिक चूक की है, तो उसकी सजा किसी भी स्थिति में मेधावी अभ्यर्थी को नहीं दी जा सकती।
जाति और स्थायी निवास में नहीं हुआ कोई बदलाव
हाईकोर्ट ने दोनों प्रमाणपत्रों का बारीकी से अवलोकन करने के बाद कहा कि 2019 और 2022 में जारी दोनों प्रमाणपत्रों में चंचला की जाति और स्थायी निवास का पता बिल्कुल एक समान है। यह मामला ऐसा बिल्कुल नहीं है जहां किसी महिला ने शादी के बाद पति की जाति का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास किया हो। कोर्ट ने JPSC के उस तर्क को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें आयोग ने कहा था कि बाद में पिता के नाम वाला नया प्रमाणपत्र स्वीकार करना विज्ञापन की शर्तों के खिलाफ होगा।
आरक्षण के संवैधानिक अधिकार का हनन बर्दाश्त नहीं
अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जाति प्रमाणपत्र किसी व्यक्ति की जन्मजात सामाजिक स्थिति का कानूनी प्रमाण होता है। केवल प्रशासनिक प्रक्रिया में हुई ऐसी त्रुटि, जो अभ्यर्थी के कारण नहीं हुई, उसके संवैधानिक आरक्षण अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकती। JPSC द्वारा जारी विज्ञापन के प्रारूप में भी पति का नाम दर्ज करने का विकल्प मौजूद था। ऐसे में हाईकोर्ट के इस फैसले ने न केवल चंचला कुमारी की वर्षों की मेहनत को न्याय दिलाया है, बल्कि व्यवस्था की गलती से जूझ रहे तमाम अभ्यर्थियों के लिए एक नई उम्मीद जगाई है।
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