औलाद नहीं थी, तो पड़ोसियों ने निभाया बेटे-बेटी का फर्ज; 85 साल की राम कुमारी को पालकी में लेकर निकले बाबा धाम
85 साल की राम कुमारी देवी के अपने कोई बेटा-बेटी नहीं हैं, लेकिन बाबा बैद्यनाथ के दर्शन की उनकी इच्छा को पड़ोसियों ने अपना सपना बना लिया। मुजफ्फरपुर की राधा देवी, उनके पति और दो अन्य लोगों ने बांस-खटिया से पालकी बनाई और राम कुमारी को लेकर सुल्तानगंज से देवघर की 105 किमी यात्रा पर निकल पड़े।


कहते हैं रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते कुछ रिश्ते इंसानियत से बनते हैं, और जब इंसानियत दिल में उतर जाए तो पराया भी अपना बन जाता है।ऐसी ही नजारा असरगंज कच्ची कांवरिया पथ पर देखने को मिला। लखनऊ की रहने वाली 85 वर्षीय राम कुमारी देवी की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिसे सुनकर शायद आपकी आंखें भी नम हो जाएंगी। राम कुमारी देवी के अपने कोई बेटा-बेटी नहीं हैं। पति फकीरा साहनी उम्रदराज हैं और अब काम करने की स्थिति में नहीं हैं। जिंदगी जैसे-तैसे गुजर रही थी।लेकिन सावन में बाबा भोलेनाथ के दर्शन की इच्छा राम देवी के मन में थी।
वह देवघर जाना चाहती थीं। बाबा बैद्यनाथ के दरबार में माथा टेकना चाहती थीं। लेकिन पैरों में चोट थी। उम्र 85 साल और साथ जाने वाला अपना कोई नहीं था। तभी वहाँ बिहार के मुजफ्फरपुर के पड़ोस में रहने वाली राधा देवी और उनके पति और वहां के दो और पड़ोसी ने उनका हाथ थाम लिया।
रोती हुई दादी ने कहा- मेरा भी बेटा-बेटी होता तो...
राधा देवी ने कहा दादी रो रही थीं कि अगर मेरा भी बेटा या बेटी होता तो मुझे बाबा धाम घुमाने ले जाता। हमने कहा दादी आप मत रोइए, हम आपके बच्चे बनकर आपको बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक ले जाएंगे। और फिर जो हुआ, वह सिर्फ आस्था नहीं, इंसानियत की मिसाल बन गई। पड़ोसियों ने करीब दो हजार रुपये खर्च कर बांस और खटिया से पालकी तैयार की। चार लोगों का जत्था बना... दो पुरुष और दो महिलाएं और 85 साल की राम देवी को पालकी में बैठाकर सुल्तानगंज से जल भरकर बाबा बैद्यनाथ की 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकल पड़े। किरण कहती है "हमारा सपना बाद में पूरा होगा, पहले दादी का सपना पूरा करना है। जब तक दादी का जल बाबा पर नहीं चढ़ा देंगे, तब तक वापस नहीं लौटेंगे, चाहे सावन बीतकर भादो ही क्यों न आ जाए।
आंखों में खुशी, चेहरे पर संतोष
जब राम कुमारी देवी से पूछा गया कि बाबा धाम जाने की खुशी लगी, तो उनकी आंखों में उम्मीद और चेहरे पर संतोष नज़र आ रहा था। उन्होंने कहा कि हम बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने जा रहे हैं. बाबा नगरी , इस बात की हमें बहुत खुशी है। सोचिए जिस बुजुर्ग मां के पास अपनी औलाद नहीं थी, उसके लिए पड़ोसियों ने औलाद का फर्ज निभा रहा था। जिसे सहारे की जरूरत थी, उसे कंधा मिल गया। जिसे पालकी की जरूरत थी, उसे चार हाथ और कंधे मिल गए।
जिस मां के दिल में बाबा के दर्शन की अधूरी इच्छा थी, उसे पूरा करने के लिए कुछ लोग अपनी मंजिल छोड़कर उसकी मंजिल के साथी बन गए। यह कहानी सिर्फ सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा नहीं है। यह उस भारत की तस्वीर है, जहां आज भी इंसानियत जिंदा है।रिश्ता खून का नहीं था... लेकिन फर्ज बेटे-बेटी से बढ़कर था। और शायद यही बाबा भोलेनाथ की सबसे बड़ी पूजा है। किसी बेसहारे के चेहरे पर मुस्कान लाना और किसी की अधूरी आस्था को उसकी मंजिल तक पहुंचाना। मुजफ्फरपुर के रहने वाली है राधा देवी और उनके पति लखनऊ में मजदूरी करते है। वह बिहार बाबा बैद्यनाथ जाने के लिए आए थे। वही किरण देवी भी और एक अन्य लखनऊ से आए है।
(मुंगेर से सुमित कुमार की रिपोर्ट)

specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.
Related Posts

अदाणी के निर्माणाधीन पावर प्लांट में पहली बार आजादी का जश्न, तिरंगे के रंग में सजा पूरा परिसर

शिक्षिका की कलम, कुमार सानू की आवाज रिलीज हुआ खास राष्ट्रगीत...एक बार जरूर सुने!







