वृद्धाश्रम के आश्रितों पर बेदर्द सिस्टम की मार, बंद हो गई सरकारी मदद, समाजसेवियों के भरोसे बेसहारा बुजुर्ग
जिले का एकमात्र वृद्धाश्रम भी अब सरकार की बेरुखी के कारण बंद होने की कगार पर आ गया है. स्थानीय लोग या समाजसेवियों द्वारा की जाने वाली मदद के कारण यहां बुजुर्गों को खाना मिल पा रहा है. वहीं प्रशासन चुप्पी साधे हुए है.

Motihari, Bihar: मोतिहारी में करीब दो वर्ष पहले बड़े तामझाम, संवेदनशील दावों और मानवता की मिसाल पेश करने के उद्देश्य से जिस वृद्धा आश्रम की शुरुआत हुई थी, आज वही आश्रम सरकारी उपेक्षा और सिस्टम की बेरुखी का शिकार बन चुका है. जिन बुजुर्गों को उनके अपने परिवार ने बोझ समझकर अकेला छोड़ दिया था, अब उन्हें प्रशासनिक तंत्र ने भी लगभग बेसहारा छोड़ दिया है. कभी सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक माना जाने वाला यह वृद्धा आश्रम आज भुखमरी, चिंता और अनिश्चित भविष्य का दर्द झेल रहा है.
वृद्धाश्रम में 11 कमरों की है व्यवस्था
मोतिहारी के बरियारपुर स्थित पंचायत भवन में नगर निगम की पहल पर इस वृद्धा आश्रम की शुरुआत की गई थी. उस समय इसे जिले की एक बड़ी मानवीय उपलब्धि के तौर पर प्रचारित किया गया था. कहा गया था कि जिन बुजुर्गों के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं है, जिनके अपने ही उन्हें असहाय छोड़ चुके हैं, उन्हें यहां सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिलेगा. आश्रम में रहने वाले वृद्ध लोगों के लिए 11 कमरों की व्यवस्था की गई थी. शुद्ध पेयजल के लिए आरओ लगाया गया, कपड़े साफ करने के लिए वॉशिंग मशीन की व्यवस्था हुई, बेहतर भोजन, दवा और देखभाल का दावा किया गया.
जिला प्रशासन ने की थी सराहना
शुरुआती दिनों में जिला प्रशासन भी इस आश्रम को लेकर काफी सक्रिय दिखाई देता था. जिले के डीएम खुद वृद्धाश्रम पहुंचते थे, वहां बुजुर्गों के साथ बैठकर भोजन करते थे और भोजन की गुणवत्ता जांचने की बात कही जाती थी. इसकी तस्वीरें जिला प्रशासन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा की जाती थीं और लोगों के बीच यह संदेश देने की कोशिश होती थी कि प्रशासन बुजुर्गों की चिंता को लेकर गंभीर है. उस समय लोग इस पहल की जमकर सराहना करते थे और इसे समाज के लिए प्रेरणादायक कदम बताया जाता था.
सरकारी विभाग से नहीं मिल रही मदद
लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के अनुसार पिछले करीब दो महीनों से यहां सरकारी स्तर पर भोजन की व्यवस्था बंद है. जिन लोगों को सहारे की जरूरत थी, वे आज दो वक्त के भोजन के लिए दूसरों की दया पर निर्भर हो चुके हैं. आश्रम में रह रहे कई बुजुर्गों की आंखों में डर साफ दिखाई देता है. उन्हें यह चिंता सताने लगी है कि अगर समाजसेवी और स्थानीय लोग मदद करना बंद कर दें, तो उनका क्या होगा.
मेयर प्रीति कुमारी बताती हैं कि सरकार के आदेशानुसार मोतिहारी के इस वृद्धाश्रम के बुजुर्गों को मुजफ्फरपुर ले जाए जाने का निर्देश प्राप्त हुआ है. मेयर के अनुसार जो सुविधाएं इन्हें यहां दी जा रही थी वे सारी सुविधाएं उन्हें वहां भी मिलेंगी.
आश्रम बंद करने की तैयारी
जानकारी के अनुसार मोतिहारी नगर निगम द्वारा शुरू किए गए इस वृद्धाश्रम को बंद करने की तैयारी चल रही है. बताया जा रहा है कि समाज कल्याण विभाग द्वारा पश्चिम चंपारण के बेतिया में नया वृद्धाश्रम संचालित किया जा रहा है और अब मोतिहारी के बुजुर्गों को भी वहीं भेजने की योजना बनाई गई है. मोतिहारी नगर निगम की मेयर प्रीति कुमारी का कहना है कि बेतिया में बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही है और वहां मोतिहारी के वृद्ध लोगों को भी रखा जाएगा.
सामाजिक संगठन उठा रहे सवाल
हालांकि इस फैसले पर अब सवाल उठने लगे हैं. सामाजिक संगठनों और जागरूक लोगों का कहना है कि आखिर बिहार के बड़े जिलों में शामिल मोतिहारी में चल रहे इकलौते वृद्धाश्रम को बंद करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या मोतिहारी जैसे बड़े शहर में बुजुर्गों के लिए एक आश्रय स्थल भी नहीं बचाया जा सकता? लोग यह भी पूछ रहे हैं कि क्या नगर निगम इतना कमजोर हो गया है कि वह एक वृद्धा आश्रम का खर्च नहीं उठा सकता?
बुजुर्गों का दर्द
सबसे बड़ी बात यह है कि आश्रम में रह रहे कई बुजुर्ग खुद बेतिया नहीं जाना चाहते. उनका कहना है कि मोतिहारी में उन्हें बेहतर माहौल, इलाज, देखभाल और सम्मान मिल रहा था. यहां का वातावरण उनके लिए घर जैसा बन चुका था. उम्र के इस पड़ाव पर वे फिर से नए जगह जाकर खुद को ढालने की स्थिति में नहीं हैं. कुछ बुजुर्गों ने तो यह तक कहा कि "हमको यहां छोड़ दिया गया, अब यहां से भी हटाया जा रहा है, आखिर हम जाएं तो जाएं कहां?"
प्रशासन ने फेरा मुंह.. जनता उठा रही जिम्मेदारी
फिलहाल हालात ऐसे हैं कि समाज के कुछ संवेदनशील लोग चंदा जुटाकर वृद्धाश्रम में भोजन की व्यवस्था करवा रहे हैं. स्थानीय समाजसेवी समय-समय पर राशन और जरूरी सामान पहुंचा रहे हैं ताकि यहां रह रहे बुजुर्ग भूखे न रहें. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह जिम्मेदारी समाज के लोगों पर क्यों आ गई? जिनके कंधों पर व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है, वे आखिर चुप क्यों हैं?
यह मामला सिर्फ एक वृद्धाश्रम का नहीं है, बल्कि उस संवेदनशीलता का है जिसकी बातें मंचों और भाषणों में तो खूब होती हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर वही संवेदनाएं फाइलों और सरकारी प्रक्रियाओं में दबकर रह जाती हैं. आज मोतिहारी का यह वृद्धाश्रम सिस्टम से यही सवाल पूछ रहा है कि क्या बुजुर्गों की जिंदगी और सम्मान की कीमत सिर्फ उद्घाटन और फोटो तक ही सीमित रह गई है?
(मोतिहारी से प्रतीक सिंह की रिपोर्ट)
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