पिता पर थी निर्भर, भाइयों ने मोड़ा मुंह! झारखंड हाईकोर्ट ने CMPFO को दिया विवाहित बेटी को नौकरी देने का आदेश
झारखंड हाईकोर्ट ने शादीशुदा बेटी की अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज करने वाला CMPFO का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने पिता पर निर्भर रहीं किरण पासवान को नियमों के तहत आठ सप्ताह में नौकरी देने का निर्देश दिया।

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने धनबाद निवासी किरण ए. पासवान की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (CMPFO) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उनकी नियुक्ति का दावा खारिज कर दिया गया था। अदालत ने 12 अगस्त 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में संबंधित विभाग को सख्त निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को निर्धारित नियमों के तहत आठ सप्ताह के भीतर अनुकंपा नियुक्ति दी जाए।
सेवा के दौरान हुई थी पिता की मृत्यु, नौकरी वाले भाइयों ने मोड़ा मुंह
याचिकाकर्ता किरण पासवान के पिता अर्जुन प्रसाद धनबाद क्षेत्र के CMPFO में सहायक के पद पर कार्यरत थे। 25 नवंबर 2013 को सेवा के दौरान ही उनका निधन हो गया था। उनके परिवार में पत्नी जयंती देवी, बेटी किरण और दो बेटे सत्य प्रकाश प्रसाद तथा रवि कुमार शामिल थे। पिता के निधन के बाद किरण ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए दावा किया था, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि किरण शादीशुदा हैं, उनके पति की अपनी आमदनी है और दोनों भाई भी नौकरी में हैं। हालांकि, हाईकोर्ट की सुनवाई में यह बात सामने आई कि दोनों भाई नौकरी में जरूर थे, लेकिन वे अपनी अलग जिंदगी जी रहे थे और उन्होंने अपनी मां की देखभाल व आर्थिक जिम्मेदारी लेने से साफ इनकार कर दिया था।
पति की कम आय से खत्म नहीं होती निर्भरता
अदालत ने मामले की तह तक जाते हुए पाया कि याचिकाकर्ता की मां ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए दिए गए आवेदन में स्पष्ट किया था कि शादी के बाद भी उनकी बेटी अपने पिता पर पूरी तरह निर्भर थी। किरण स्वयं कहीं कोई नौकरी नहीं कर रही थीं और वह अपनी वृद्ध मां के साथ ही रह रही थीं। दोनों का जीवन CMPFO से मिलने वाली सीमित पेंशन और किरण के पति की बेहद कम आय पर ही निर्भर था। अदालत ने कहा कि मां के स्वास्थ्य और पारिवारिक परिस्थितियों को देखते हुए केवल इस तकनीकी आधार पर दावे को खारिज नहीं किया जा सकता कि बेटी विवाहित है या उसके पति की कुछ आमदनी है।
DoPT नियमों का हवाला, कहा- पेंशन नौकरी का विकल्प नहीं
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 30 मई 2013 के निर्देश का भी प्रमुखता से उल्लेख किया। इस नियम के तहत यदि कोई शादीशुदा बेटी अपने पिता पर पूरी तरह निर्भर रही हो और उसे परिवार के अन्य आश्रित सदस्यों का भरण-पोषण करना हो, तो वह अनुकंपा नियुक्ति की हकदार है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने साफ कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को तत्काल राहत देना है, इसे तकनीकी या प्रक्रियात्मक कठोरता के नाम पर कमजोर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि परिवार को मिलने वाली पेंशन को किसी भी हाल में अनुकंपा नियुक्ति का विकल्प नहीं माना जा सकता। इसी के साथ अदालत ने CMPFO के 12 फरवरी 2024 के अस्वीकृति आदेश को रद्द करते हुए 8 सप्ताह के अंदर नौकरी देने का फरमान जारी कर दिया।
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