Sarhul Mahaparva: झारखंड में आज प्रकृति का महापर्व सरहुल बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा है. आदिवासियों और मूलवासियों का यह पर्व जल, जंगल और जमीन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे बड़ा महापर्व है. सरहुल का यह पर्व प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है जिसमें साल वृक्ष (सखुआ) की पूजा की जाती है यह पर्व पारंपरिक नृत्य-संगीत और सामूहिक उल्लास के साथ मनाया जाता है जो प्रकृति के साथ संतुलन और सामंजस्य का संदेश देता है.
आदिवासी मान्यताओं के मुताबिक, सखुआ के वृक्ष में उनके ईष्ट देव का वास होता है. और जब सखुआ के पेड़ों में नए-नए फूल खिलते हैं तब इस महापर्व सरहुल की शुरुआत होती है. यह पर्व झारखंड के अलग-अलग आदिवासी समुदाय जैसे कि उरांव, मुंडा, हो, संताल के लिए केवल एक त्यौहार ही नहीं है बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का एक माध्यम है. जिसे वे बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं.
इस महापर्व को लेकर रांची में एक अनोखी परंपरा कई वर्षों से चलता आ रहा है जिसमें लोगों द्वारा शहर के अलग-अलग अखाड़ों और भिन्न-भिन्न स्थानों से सरहुल का भव्य शोभा यात्रा निकाला जाता है जो सिरमटोली केंद्रीय सरना स्थल पहुंचती है. इस अवसर पर आज, 21 मार्च 2026 यानी शनिवार को रांची और आसपास के इलाकों और अलग-अलग अखाड़ों से आदिवासी समुदाय के लोगों द्वारा भव्य शोभा यात्रा निकाली जाएगी. इस शोभा यात्रा के जरिए लोग सिरमटोली केंद्रीय सरना स्थल पहुंचेंगे और वहां पूजा-पाठ करेंगे और इसके बाद फिर वापस अपने-अपने घरों को लौटेंगे.
वर्ष 1967 से रांची में निकाली जा रही भव्य शोभायात्रा
महापर्व सरहुल के अवसर पर पिछले कुछ दशकों से राजधानी रांची सहित राज्य के कई जिलों में भव्य शोभा यात्रा निकाली जा रही है लेकिन हम आपको बता दें, इस शोभा यात्रा की शुरूआत वर्षों पहले कार्तिक उरांव के नेतृत्व में निकाली जा रही है. सबसे पहले उनके ही नेतृत्व में आदिवासी जमीनों की रक्षा के उद्देश्य से वर्ष 1967 में शोभा यात्रा निकाली गई थी. जिसके बाद से यह परंपरा चली आ रही है. बता दें, सरहुल के भव्य शोभा यात्रा के माध्यम से आदिवासी समुदाय के लोगों द्वारा अपनी संस्कति, परंपरा और जीवनशैली को प्रदर्शित किया जाता है. वे पूरी दुनिया को अपने इस यात्रा के दौरान बताना चाहते हैं कि उल्लास और उमंग का रहस्य प्रकृति में ही छिपा है.









