"छोटे कर्मचारियों पर गाज और बड़े साहबों का सिर्फ तबादला?" बोकारो केस में झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को घेरा
बोकारो की 18 वर्षीय लापता युवती मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने IG, DIG और SP के तबादले को दंडात्मक कार्रवाई मानने से इनकार किया। सरकार से 10 दिनों में जवाब मांगा।

बोकारो की 18 साल की लापता युवती के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर बेहद सख्त नाराजगी जताई है। अदालत ने साफ कर दिया है कि मामले में लापरवाही बरतने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का सिर्फ ट्रांसफर कर देना कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं है। अदालत ने राज्य सरकार को 10 दिनों की मोहलत देते हुए निर्देश दिया है कि वह IG, DIG और बोकारो SP जैसे बड़े अधिकारियों के खिलाफ की गई वास्तविक विभागीय कार्रवाई की स्थिति पर जवाब दाखिल करे।
तबादले को सजा नहीं मानती अदालत
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को जानकारी दी गई कि जांच से जुड़े कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, जिनमें IG, DIG और बोकारो के SP शामिल हैं, का तबादला कर दिया गया है। इस तर्क पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट कहा कि तबादला एक नियमित विभागीय प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे किसी भी सूरत में लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक या दंडात्मक कार्रवाई नहीं माना जा सकता।
निचले कर्मचारियों पर गाज, बड़े साहबों को छूट क्यों?
सुनवाई के दौरान अदालत का रुख इस बात पर भी कड़ा रहा कि कार्रवाई का दायरा केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित क्यों रखा गया है। इससे पहले सरकार ने कोर्ट को बताया था कि संबंधित पिंडराजोड़ा थाने के 28 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है और इनमें से चार के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी चल रही है। इस पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाया था कि नियंत्रणकारी प्राधिकारी यानी कंट्रोलिंग अथॉरिटी के रूप में जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारियों को क्यों बख्शा जा रहा है। कोर्ट अब यह जानना चाहता है कि बड़े अफसरों पर कागजों से इतर धरातल पर क्या कार्रवाई हुई है।
जानिए क्या है लापता बेटी का पूरा मामला
यह पूरा मामला लापता युवती की मां रेखा देवी की ओर से दायर हेबियस कॉर्पस याचिका से जुड़ा हुआ है। 18 वर्षीय यह युवती 31 जुलाई 2025 से संदिग्ध परिस्थितियों में गायब है। इस संबंध में बोकारो के पिंडराजोड़ा थाना में कांड संख्या 147/2025 दर्ज कराया गया था। लंबे समय तक बेटी का सुराग न मिलने और पुलिस की कथित ढिलाई से तंग आकर परिवार को हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
अदालत की पहल पर हाल ही में कोलकाता स्थित केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL) से मिली माता-पिता की DNA जांच रिपोर्ट एसआईटी को सौंपी गई थी। इस मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता विनसेंट रोहित मार्की और अधिवक्ता शांतनु गुप्ता ने पक्ष रखा। अब हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद राज्य सरकार को 10 दिनों के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों पर हुई कार्रवाई की विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होगी।
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