जीवन के अधिकार पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, गंभीर रूप से बीमार बंदी को मिलेगा विशेष इलाज
गंभीर हृदय रोग से पीड़ित न्यायिक हिरासत में बंद आरोपी के लिए एम्स में तत्काल उपचार सुनिश्चित करने का निर्देश, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार पर हाईकोर्ट ने दोहराया संवैधानिक दायित्व।

पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि न्यायिक हिरासत में रहने वाला कोई भी व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने शोभा देवी की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके पति करणवीर सिंह यादव उर्फ लल्लू मुखिया को आवश्यक विशेष चिकित्सा उपलब्ध कराने के निर्देश जारी किए हैं।
करणवीर सिंह यादव वर्तमान में बरह थाना कांड संख्या-98/2023 के सिलसिले में भागलपुर स्थित विशेष केंद्रीय कारा में न्यायिक हिरासत में बंद हैं। उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 120बी और 34 के साथ-साथ आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत मामला दर्ज है। इससे पहले उनकी नियमित जमानत याचिका (क्रिमिनल मिसलेनियस संख्या 4099/2026) को 21 अप्रैल 2026 को पटना उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्टों में बताया गया कि जिला स्तरीय मेडिकल बोर्ड, भागलपुर और इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस), पटना के विशेषज्ञों ने जांच के बाद पाया कि बंदी गंभीर हृदय रोग से पीड़ित हैं। उनकी हृदय की कई धमनियों में गंभीर अवरोध है और उन्हें शीघ्र उच्च स्तरीय उपचार की आवश्यकता है। मेडिकल बोर्ड ने उन्हें बेहतर इलाज के लिए एम्स, नई दिल्ली भेजने की अनुशंसा भी की थी।
याचिका में यह भी कहा गया कि मेडिकल बोर्ड की सिफारिश के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने समय पर आवश्यक कार्रवाई नहीं की, जिससे बंदी के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बना रहा। मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय ने प्रशासन को निर्देश दिया कि बिना किसी अनावश्यक विलंब के उन्हें अनुशंसित विशेष चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए तथा उनके उपचार में किसी प्रकार की लापरवाही न बरती जाए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीमती निवेदिता निर्विकार ने पक्ष रखा, जबकि अधिवक्ता मधुमय मधुप ने उनकी सहायता की।
यह आदेश एक बार फिर इस संवैधानिक सिद्धांत को रेखांकित करता है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता भले ही न्यायिक प्रक्रिया के तहत सीमित हो, लेकिन उसके जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी बनी रहती है।
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