मोदी सरकार के 12 साल: मोतिहारी के किसान बेहाल, चीनी मिल का वादा बना चुनावी जुमला?
"अगली बार मोतिहारी की चीनी से बनी चाय पिऊंगा" — यह वादा आज भी किसानों को याद है, लेकिन 12 साल बाद न चीनी मिली, न चाय बनी और न ही वादा पूरा हुआ।

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के 12 साल पूरे होने पर भाजपा "12 साल बेमिसाल" का जश्न मना रही है। देशभर में उपलब्धियों के पोस्टर लग रहे हैं, वीडियो चल रहे हैं और विकास के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन पूर्वी चंपारण के किसानों के लिए यह सवाल आज भी जस का तस खड़ा है कि आखिर उनकी चीनी मिलों का क्या हुआ?
वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी मोतिहारी के गांधी मैदान पहुंचे थे, तब मंच से उन्होंने ऐसा वादा किया था जिसने हजारों किसानों की उम्मीदों को नई उड़ान दी थी। उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार बनने पर बंद पड़ी चीनी मिलों को चालू कराया जाएगा और अगली बार जब वह मोतिहारी आएंगे तो यहीं की चीनी से बनी चाय पिएंगे।
सरकार बनी... एक बार नहीं, लगातार तीन बार बनी। प्रधानमंत्री भी कई बार मोतिहारी आए। लेकिन न चीनी मिल चालू हुई, न किसानों के खेतों में गन्ने की हरियाली लौटी और न ही मोतिहारी की चीनी वाली चाय का सपना पूरा हुआ। हां, चुनावी मंचों पर वादों की मिठास जरूर घुलती रही।
आज हालत यह है कि चकिया और हनुमान शुगर मिल का नाम सुनकर किसानों के चेहरे पर मुस्कान नहीं, बल्कि मायूसी दिखती है। जिन मिलों को कभी चंपारण की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था, वे अब खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। सूत्र बताते हैं कि मिलों की बड़ी हिस्सेदारी वाली जमीनें बिक चुकी हैं, मशीनें कबाड़ बन चुकी हैं और परिसर के आसपास आबादी बस चुकी है। यानी जिस मिल को कभी चालू करने का सपना दिखाया गया था, वह अब इतिहास के पन्नों में दफन होने की कगार पर है।
िडंबना देखिए कि हर चुनाव में नेताओं को चीनी मिल याद आती है। मंच से किसानों के नाम पर भावुक भाषण दिए जाते हैं, रोजगार के सपने दिखाए जाते हैं, उद्योग पुनर्जीवित करने के वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही चीनी मिल का मुद्दा भी पोस्टर और भाषणों के साथ गायब हो जाता है।
सबसे बड़ा सवाल स्थानीय नेतृत्व पर भी उठता है। जब केंद्र में मोदी सरकार बनी तो मोतिहारी के माननीय को देश का कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री बनाया गया। जिले के लोगों को लगा कि अब तो चंपारण की किस्मत बदल जाएगी। किसान उम्मीद लगाए बैठे थे कि अपना सांसद केंद्र में ताकतवर मंत्री बना है, अब बंद मिलों के गेट खुलेंगे, गन्ने की खेती को नया जीवन मिलेगा और युवाओं को रोजगार मिलेगा।
लेकिन मंत्री पद की ताकत दिल्ली की राजनीति तक तो दिखी, पर चंपारण की बंद चीनी मिलों के गेट तक नहीं पहुंच सकी। वर्षों तक केंद्रीय कृषि मंत्री रहने के बावजूद मिल को लेकर न तो कोई ठोस पुनरुद्धार योजना धरातल पर उतरी और न ही किसानों को वह राहत मिली जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
यह सिर्फ एक उद्योग के बंद होने की कहानी नहीं है। यह हजारों किसानों की टूटी उम्मीदों, बेरोजगार हुए मजदूरों, बर्बाद हुए छोटे कारोबारियों और पलायन को मजबूर युवाओं की कहानी है। जिन मिलों की सायरन कभी पूरे इलाके की पहचान थी, वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है।
राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके लिए चीनी मिल चुनावी मुद्दा है, लेकिन किसानों के लिए जीवन का सवाल। नेता मंच से घोषणा करते हैं, तालियां बटोरते हैं और चुनाव जीत जाते हैं। किसान हर बार भरोसा करते हैं और हर बार ठगे जाते हैं।
आज जब मोदी सरकार अपने 12 वर्षों की उपलब्धियां गिना रही है, तब लोग पूछ रहे है—आखिर वह वादा कहां गया जिसमें मोतिहारी की चीनी से बनी चाय की बात कही गई थी?
लोग यह भी पूछ रहे हैं कि यदि 12 साल में भी चीनी मिल नहीं खुली, तो फिर कब खुलेगी? और यदि अब खुलना संभव ही नहीं है, तो क्या जनता को सिर्फ सपने दिखाए गए थे?
मोतिहारी की जनता के बीच आज एक चर्चा आम है—नेताओं ने चीनी मिल की मिठास का वादा किया था, लेकिन 12 साल बाद किसानों के हिस्से में सिर्फ इंतजार, बेरोजगारी और टूटे हुए वादों की कड़वाहट आई है।
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