झारखंड हाईकोर्ट ने बदला सरकार का फैसला, उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों में पूर्व सदस्यों को मिला सेवा विस्तार
झारखंड हाईकोर्ट ने उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों के पूर्व अध्यक्षों और सदस्यों की पुनर्नियुक्ति का आदेश दिया। कोर्ट ने सरकार की 10 अक्टूबर 2025 की अधिसूचना में संशोधन करते हुए चार याचिकाकर्ताओं को निरंतर सेवा का लाभ देने का निर्देश दिया।

झारखंड हाईकोर्ट ने जिला और राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों के अध्यक्षों व सदस्यों के कार्यकाल और पुनर्नियुक्ति को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने चार रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की 10 अक्टूबर 2025 की अधिसूचना में संशोधन करने का स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत नियुक्त और कार्यरत रहे अध्यक्षों व सदस्यों को सिर्फ इस तकनीकी आधार पर लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि उनका कार्यकाल 21 मई 2025 से पहले समाप्त हो चुका था। 12 अगस्त 2026 को सुनाए गए इस फैसले से उपभोक्ता आयोगों में कार्यरत रहे अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है।
चार जिलों के अध्यक्ष और सदस्यों की तत्काल पुनर्नियुक्ति का आदेश
हाईकोर्ट ने चारों याचिकाकर्ताओं को संबंधित उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों में तत्काल पुनर्नियुक्त करने का आदेश जारी किया है। अदालत के आदेशानुसार, उमेश सिंह को जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, लातेहार में सदस्य, सुरेश चंद्र जायसवाल को जामताड़ा आयोग में अध्यक्ष, बिमल कुमार लकड़ा को सिमडेगा आयोग में सदस्य और चंदन बनर्जी को दुमका आयोग में सदस्य के पद पर पुनः बहाल किया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देशित किया है कि इन सभी की नियुक्ति को क्रमशः 8 फरवरी 2025, 30 दिसंबर 2024, 21 सितंबर 2024 और 2 नवंबर 2024 से निर्बाध रूप से जारी माना जाएगा। यह विशेष व्यवस्था आयोगों में नई नियमित भर्ती होने अथवा नियमों में आवश्यक संशोधन किए जाने तक पूरी तरह प्रभावी रहेगी।
राज्य सरकार की 10 अक्टूबर की अधिसूचना को अदालत ने बदला
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की 10 अक्टूबर 2025 की अधिसूचना का कानूनी पहलू सामने आया, जिसमें केवल उन्हीं अध्यक्षों और सदस्यों के कार्यकाल को आगे बढ़ाने का प्रावधान किया गया था जो 21 मई 2025 या उसके बाद सेवानिवृत्त हुए थे। राज्य सरकार की दलील थी कि 21 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के वक्त जो लोग पद पर कार्यरत थे, उन्हें ही यह सेवा विस्तार दिया गया है और याचिकाकर्ताओं का कार्यकाल उससे पहले खत्म होने के कारण वे इसके पात्र नहीं हैं। हाईकोर्ट ने सरकार के इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में 21 मई 2025 को पात्रता तय करने वाली कोई कटऑफ तारीख निर्धारित नहीं किया गया था, बल्कि वह केवल फैसले की तारीख थी।
सुप्रीम कोर्ट के Limaye-II फैसले के विपरीत थी सरकारी व्याख्या
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के Limaye-II मामले में 21 मई 2025 को दिए गए दिशा-निर्देशों का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि Limaye-I से पहले नियुक्त और कार्यरत राज्य व जिला आयोगों के अध्यक्षों व सदस्यों को उनका पूरा कार्यकाल पूरा करने दिया जाएगा और नई भर्ती प्रक्रिया पूरी होने तक उन्हें पद पर बनाए रखा जा सकता है। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में पाया कि चारों याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति अक्टूबर से नवंबर 2021 के बीच हुई थी और वे Limaye-I के 3 मार्च 2023 के फैसले से पहले ही सेवा में थे। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की 10 अक्टूबर की अधिसूचना सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मूल भावना के विपरीत थी, इसलिए चारों रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए सभी को नियमानुसार निरंतर सेवा का लाभ देने का फैसला सुनाया गया।
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