मोदी सरकार के 12 साल और 6 विवादित फैसले, जिस दौरान जमकर हुए विरोध और हंगामे
12 साल के लंबे कार्यकाल के दौरान अब तक कई मौकों पर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला गया. सरकार कभी नोटबंदी तो कृषि कानून को लेकर फंसती नजर आई है.

Modi Government 12 Years: प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने केंद्र में अपने 12 साल पूरे कर लिए हैं. इस अवसर पर पूरे देश में भाजपाइयों और उनके समर्थकों द्वारा जश्न मनाया जा रहा है. वहीं सरकार अपनी उपलब्धियां गिना रही है. लेकिन इस कार्यकाल के दौरान कई ऐसे भी मौके आए जब सरकार के फैसलों के विरोध में पूरे देश में प्रदर्शन हुए, सरकार को घेरने का भी प्रयास किया गया.
तीन कृषि कानून
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का मानना था कि इन कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी, जिससे पूरी खेती बड़े कॉरपोरेट घरानों के नियंत्रण में चली जाएगी. लाखों किसानों ने 'संयुक्त किसान मोर्चा' के बैनर तले दिल्ली की सीमाओं (सिंघू, टीकरी और गाजीपुर) पर एक साल से अधिक समय तक ऐतिहासिक धरना दिया. भारी राजनीतिक दबाव और आगामी चुनावों को देखते हुए नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इन तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा की.
अग्निपथ योजना
सेना में भर्ती की तैयारी करने वाले युवाओं का तर्क था कि 4 साल की अल्पकालिक सेवा के बाद 75% 'अग्निवीरों' को बिना पेंशन और बिना ग्रेच्युटी के सेवामुक्त कर दिया जाएगा, जिससे उनका भविष्य असुरक्षित हो जाएगा. साल 2022 में इस योजना के लॉन्च होते ही बिहार, उत्तर प्रदेश, सिकंदराबाद और हरियाणा सहित कई राज्यों में युवाओं ने उग्र और हिंसक प्रदर्शन किए, ट्रेनों में आग लगाई और रेलवे ट्रैक जाम किए. विरोध के बावजूद सरकार ने योजना को वापस नहीं लिया, बल्कि उम्र सीमा में कुछ ढील दी और असम राइफल्स व केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPFs) में अग्निवीरों के लिए 10% आरक्षण की घोषणा की.
Electoral Bonds Scheme
विपक्षी दलों, चुनाव विश्लेषकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं (जैसे ADR) का आरोप था कि चंदा देने वालों की पहचान गुप्त रखने से राजनीतिक फंडिंग में अपारदर्शिता आई. इसके जरिए शेल कंपनियों (फर्जी कंपनियों) और कॉरपोरेट घरानों द्वारा सत्तारूढ़ दल को अवैध फायदा पहुंचाने का आरोप लगा. इसके खिलाफ सड़कों पर बड़े प्रदर्शन नहीं हुए, बल्कि सुप्रीम कोर्ट में एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई. फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को पूरी तरह असंवैधानिक और सूचना के अधिकार (RTI) का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया और एसबीआई (SBI) को सारा डेटा सार्वजनिक करने का आदेश दिया.
नोटबंदी
8 नवंबर 2016 को अचानक 500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने से देश में नकदी (Cash) का भारी संकट खड़ा हो गया. छोटे व्यापार ठप हो गए, शादियां रुक गईं और बैंकों की लाइनों में खड़े-खड़े कई लोगों की मौत हो गई. विपक्ष ने इसे "आर्थिक आपदा" करार दिया. संसद से लेकर सड़क तक विपक्षी दलों ने सरकार को घेरा और देशव्यापी बंद का आह्वान किया. आम जनता ने असंतोष जताया, लेकिन मजबूरन उन्हें लाइनों में खड़ा रहना ही पड़ी. आरबीआई की रिपोर्ट में सामने आया कि 99.3% प्रतिबंधित नोट वापस आ गए, जिससे काले धन को खत्म करने के सरकार के मुख्य दावे पर गंभीर सवाल उठे. हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस निर्णय प्रक्रिया को कानूनी रूप से सही ठहराया.
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA)
आलोचकों और प्रदर्शनकारियों का मुख्य विरोध इस बात पर था कि इसमें पहली बार नागरिकता देने के आधार में 'धर्म' को शामिल किया गया और मुस्लिम समुदाय को इससे बाहर रखा गया. लोगों को डर था कि सीएए (CAA) को नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) के साथ जोड़कर भारतीय मुस्लिमों की नागरिकता को खतरे में डाला जा सकता है. दिसंबर 2019 से लेकर मार्च 2020 (कोरोना लॉकडाउन से पहले) तक दिल्ली के शाहीन बाग समेत देश के दर्जनों शहरों में महिलाओं और छात्रों ने अनिश्चितकालीन धरने दिए. इस दौरान दिल्ली में हिंसक दंगे भी हुए. भारी विरोध और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण सरकार ने इसके नियम लागू करने में लंबा समय लिया, लेकिन आखिरकार मार्च 2024 में इसके नियमों को अधिसूचित कर इसे देश में लागू कर दिया गया.
नया यूजीसी नियम 2026
इसी साल 13 जनवरी को सरकार यूजीसी कानून में संशोधन कर एक नया कानून लेकर आई. जिसे पूरे देश के विश्वविद्यालयों में लागू किया जाना था. सराकर का पक्ष था कि इसे जातिगत भेदभाव खत्म करने की मंशा से लाया गया है. लेकिन एक्सपर्ट्स के अनुसार इसमें खामी यह थी कि इसमें सवर्ण समुदाय का पक्ष रखने का कोई प्रावधान नहीं किया गया था. इसे लेकर पूरे देश में सवर्णों द्वारा जमकर विरोध प्रदर्शन हुए और मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया. जिसके बाद इसके लागू होने पर रोक लगा दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि इसके नियमों की परिभाषाएं स्पष्ट नहीं हैं और इसके कारण समाज बंट सकता है और स्थिति बिगड़ सकती है.
specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.









